मोदी जी ये गुंडे कुतो के झुण्ड की तरह इकठ्ठा होकर मुस्लिम किसान का शिकार कर लेते है -उदय

भारत के प्रधान मंत्री को खुला पत्र।

माननीय प्रधान मंत्री जी, 
भारत सरकार।
सादर प्रणाम। 
मै एक गरीब किसान का बेटा आशा करता हूँ की आप बहुत स्वस्थ होंगे और खुश होंगे। लेकिन देश के मौजूदा हालात देख कर लगता नही है की आप खुश होंगे। मुझे लगता है कि आप इस समय बहुत ज्यादा दुखी होंगे क्योंकि आपके राज्य में अफरा-तफरी का माहौल है। कही आपकी पोलिस मासूम छात्रों को बर्बरता से पीट रही है, उनको देश द्रोह के आरोप में जेल में डाल रही है जिनका गुनाह सिर्फ इतना सा है कि वो सस्ती शिक्षा मांग रहे है। 1100% तक बढ़ा दी गयी फ़ीस बढ़ोतरी को वापिस लेने की मांग कर रहे है। अब सस्ती शिक्षा मांगना भी आपके राज में देशद्रोह हो गया है। कहीं गौरक्षक गुंडे एक मुस्लिम किसान पहलू खान को सिर्फ इसलिये मार देते है क्योंकि वो अपने बच्चों के लिए गाय खरीद कर ला रहा था ताकि उसके बच्चे दूध पी सके लेकिन गाय की रक्षा करने के नाम पर आंतक मचाने वाले गुंडों को ये पसन्द नही है की कोई मुस्लिम दूध के लिए गाय रखे। ये गुंडे कुतो के झुण्ड की तरह इकठ्ठा होकर एक गरीब मुस्लिम किसान का शिकार कर लेते है।
वही दूसरी तरफ आपके निवास दिल्ली के पास पिछले 30 दिन से देश का अन्नदाता नंगा होकर, हाथ में अपने मृत किसान दोस्तों की खोपडिया लेकर प्रदर्शन कर रहा है। इसलिए जिस देश में छात्र और मेहनतकश अन्नदाता किसान के ये बुरे हाल हो तो उस देश के महान सम्राट का दुखी होना लाजमी है। ये किसान हजारो किलोमीटर दूर तमिलनाडु से आपके पास इस आशा के साथ आये है कि महान भारत के, महान सम्राट माननीय नरेंद्र मोदी जी, जो गाहे बगाहे अपने परिचय के दौरान बताते रहते है कि मै गरीब का बेटा हूँ। मै चाय बेचने वाले का बेटा हूँ मैने चाय बेचीं है।  मैने गरीबी और गरीब का दर्द नजदीक से देखा है। आप उन मेहनतकश किसानो का दर्द जरूर समझोगे। इसलिए वो अपने जख्मो पर मरहम लगवाने आपके पास आये है। 


लेकिन कल जब मैने आपकी जापान के प्रधानमंत्री के साथ कुछ तस्वीर देखी। आप उनके साथ मेट्रो में घूम रहे हो, उनके साथ सेल्फी ले रहे हो। उनके साथ अक्षरधाम मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ कर मस्ती कर रहे हो, जोर-जोर से हंस रहे हो। इसका मतलब आप इन छात्रों और इन किसानों के हालात पर थोड़े से भी दुखी नही हो। आपको किसान पहलू खान की हत्या से कोई दुःख नही है। सायद अंदर ही अंदर अपनी पोलिस को उनके काम के लिए शाबासी दे रहे हो। अगर ऐसा है तो गुलाम भारत के लुटेरे अंग्रेज सम्राट और आजाद देश के सम्राट में कोई अंतर नही है। मुझे भगत सिंह की वो पंगतिया याद आ रही है जो उन्होंने लुटेरे अंग्रेजो से लड़ते हुए आजाद देश के बारे में कही थी-

"हम इस बात पर विचार कर रहे थे कि क्रान्ति किन-किन ताकतों पर निर्भर है? लेकिन यदि आप सोचते हैं कि किसानों और मजदूरों को सक्रिय हिस्सेदारी के लिए आप मना लेंगे तो मैं बताना चाहता हूँ वे कि किसी प्रकार की भावुक बातों से बेवकूफ नहीं बनाये जा सकते। वे साफ-साफ पूछेंगे कि उन्हें आपकी क्रान्ति से क्या लाभ होगा, वह क्रान्ति जिसके लिए आप उनके बलिदान की माँग कर रहे हैं। भारत सरकार का प्रमुख लार्ड रीडिंग की जगह यदि सर पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास हो तो उन्हें (जनता को) इससे क्या फर्क पड़ता है? एक किसान को इससे क्या फर्क पड़ेगा, यदि लार्ड इरविन की जगह सर तेज बहादुर सप्रू आ जायें।"1क्रन्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा

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लेकिन माननीय प्रधान मंत्री जी ये जो विश्व के महानतम देश भारत की राजधानी दिल्ली की गलियारों में, जो नंगा इंसान, हाथ में मृत इंसान की खोपडिया लिए खड़ा है। ये 21 वीं सदी का भारत है जो नंगा खड़ा है। ये वो महान भारत नही है, जिस महान भारत का प्रधान मंत्री 11 लाख का कोट पहनता है, करोड़ो रूपये की गाड़ियों में चलता है, अरबो रूपये विज्ञापनों पर खर्च करता है, काजू के आटे की रोटी खाता है। वो भारत जो एक साथ 104 उपग्रह आसमान में छोड़ने का कीर्तिमान बना कर अपनी छाती ठोकता है। ये उस भारत की तस्वीर नही है ये तो उस भारत के मेहनतकश की तस्वीर है जो दिन-रात गर्मी-सर्दी, आंधी-तूफान की परवाह किये बिना हाड़ तोड़ मेहनत करता है उस मेहनत की एवज में जो सिर्फ 2 वक्त की रोटी मांग रहा है, काजू की रोटी नही गफलत में मत रहना कभी सोच बैठो की ये आपकी मतलब प्रधान मंत्री की रिस करके काजू की रोटी की मांग कर रहे है, ये तो सिर्फ गेहूं की रोटी 2 वक्त मिल जाये उसकी मांग कर रहे है। तन ढकने के लिए कपड़ा मिल जाये 11 लाख वाला सूट की मांग नही है 11 रूपये मीटर वाला कपड़ा मिल जाये। बच्चों को शिक्षा मिल जाये ताकि वो भी पढ़ लिख कर उपग्रह छोड़ने में मद्दत चाहे न कर सके क्योकि वहाँ तो आप उनको पहुचने नही दोगे क्योकि फ़ीस इतनी ज्यादा है इसलिए क्लर्क, अध्यापक ही बन जाये।


ये सब भी वो फ्री में नही चाहता है। वो मेहनतकश है उसको फ्री में मिली हुई कोई भी वस्तु नापसन्द है। वो तो अपना हग मांग रहा है। उसी हक को मांगने के लिए वो अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर देश की राजधानी में पिछले 30 दिन से प्रदर्शन कर रहा है।

वो भारत के प्रधान मंत्री से मांग कर रहा है कि पिछले लंबे समय से प्राकृतिक आपदा के चलते फसल अच्छी न होने के कारण, सरकार की कृषि विरोधी नीतियों के कारण और पूंजीपतियों की लूट के कारण भारत का किसान कर्जदार हो गया है। उस कर्जे से तंग आकर पिछले 20 सालों में 2.5 लाख किसान आत्महत्या कर चुके है। इसलिये देश का अन्न दाता आत्महत्या न करे, उसकी जमीन जो उसकी माँ है उसकी कुर्की न हो हम आपसे ये फरियाद करते है कि जो रुपया टैक्स के रूप में मेहनतकश आवाम ने सरकार के पास जमा कराया था ताकि विपदा के समय उस रूपये से पीड़ित इंसानो की मद्दत की जा सके। उसी रूपये से सरकार प्रत्येक साल लुटेरे पूंजीपतियों का लाखो करोड़ रुपया माफ़ करती है, वो ही सरकार हमारी उस जमा पूँजी में से हम भारत के मेहनतकश किसानों का ये मामूली सा कर्ज माफ कर दें। 

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"देके अपना खून पसीना तूने फसल उगाई
आंधी देखि तूफ़ान झेले बिपदा सभी उठायी
फसल कटी तो ले गए ज़ालिम तेरी नेक कमाई
लुट गया माल तेरा लुट गया माल ओये
पगड़ी संभाल जट्टा...

प्रधान मंत्री महोदय जी, 
 जिस देश का किसान बाजार में नंगा खड़ा हो, सत्ता उसको देखने की बजाए आँखे बंद कर लेती हो। उसकी चीख सुनने की बजाए कान बन्द कर लेती हो। उस सत्ता को डूबने से कोई नही बचा सकता है। जिस सत्ता के नशे में आप इन घटनाओं से आँखे फेर रहे हो। ये देश का किसान अगर आपसे आँखे फेर लेगा तो सायद ही आपके पास ये सत्ता रहे। ये लोकतंत्र है, आप जनता के लिए हो, जनता आपके लिए नही है। इसी जनता ने आपको बहुमत दिया था, इसी जनता ने आपको इस कुर्सी पर बैठाया था। इस जनता के जख्मो को दवाई लगाने का काम कीजिये, जख्मो को कुरेदने का काम न कीजिये। 
  - UDay Che (लेखक के निजी विचार है )

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