और जब मैंने कुरआन की आयात को हकीकत में बदलते देखा -राजीव शर्मा

मुझे बारातों में जाने का शौक नहीं है। न ही दावतें कोई खास पसंद हैं। मुझे याद नहीं आता कि पिछली बार किसकी बारात में गया था लेकिन बारात का एक किस्सा मुझे आज तक याद है। अगर मुझसे सुनेंगे तो आप भी इसे भूल नहीं पाएंगे। यह बात है साल 2001 में गर्मियों की। मुझे एक शादी में जाने का मौका मिला।

पहले तो खूब रसगुल्ले निचोड़कर खाए। फिर शर्बत गले में उतारा। किसी को फिक्र हो रही थी कि बैंडबाजे वाला कहां गुम हो गया, तो कोई नाई से दाढ़ी कटवा कर भरी गर्मियों में चेहरे पर सर्दी वाली क्रीम पोत रहा था। चारों ओर अजीब-सी भागमभाग मची थी। बगल वाले घर में लोग गुजारिश कर रहे थे कि मेहरबानी कर 15 मिनट के लिए बाजा न बजवाएं, वर्ना धूम-धड़ाका सुनकर हमारी भैंस खूंटा तोड़ भाग जाएगी।

अंधेरा होने को था। तभी एक बाराती को खुराफात सूझी। उसने कहा- अरे यार, धर्मशाला के उस कमरे में मेरा थैला भूल आया। जरूरी सामान था। चलो ले आएं। उसके दो साथियों ने कहा- चलो। सभी चल दिए। हम उस समय बच्चे थे। सोचा, पता नहीं थैले में क्या माल होगा! चलो चलते हैं। हम भी साथ हो लिए।



वहां एक छोटा-सा थैला रखा था। कुछ सिगरेट की डिबिया थीं। दो-चार पान थे और बाकी कोई मामूली सामान था। बारातियों ने सिगरेट पी, पान खाया। फिर इधर-उधर की बातें कर बोले- अब चलते हैं। अब तक तो डांस शुरू हो गया होगा। तभी एक बाराती ने कहा- यारो, इतनी भी क्या जल्दी है! यहां आए हो तो कुछ अपनी निशानियां छोड़कर जाओ।
दूसरे ने पूछा- कैसी निशानी?
पहले बाराती ने अपना प्लान बताया, ये जो मेहमानों के लिए गद्दे और उन पर सफेद-सफेद चादरें बिछी हुई हैं, उन पर पान की पीक थूककर जाएंगे। दूसरे दिन जो भी देखेगा, अपना माथा पीट लेगा। हमें बड़ा मजा आएगा। हो सके तो इन पर पेशाब भी करते जाओ।

हम एक कोने में खड़े थे। उनसे उम्र और ताकत में बहुत कमजोर, इसलिए मना नहीं कर सके। उन्होंने वही किया जिसका इरादा कर चुके थे। चादरों को खूब गंदा करने के बाद वे चल दिए। हम भी पीछे-पीछे चले आए। उन दिनों गांवों में बिजली की बहुत दिक्कत थी। अक्सर तो शाम को आती ही नहीं थी। अगर आती भी तो सड़कों पर कोई रोशनी नहीं होती थी। गांव अनजाना था। पता नहीं था कि रास्ते में कहां पत्थर है और कहां गड्ढा।
अचानक उनमें से एक बाराती को ठोकर लगी और वह नाले में गिर गया। उसने खुद को बचाने के लिए अपने एक और साथी को पकड़ा तो वह भी नाले में जा गिरा। उसमें घुटनों तक कीचड़ भरा था। हमने देखा तो हंसी नहीं रोक पाए। दो बाराती नाले की भेंट चढ़ गए। एक अभी तक महफूज था।

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किसी तरह पानी का इंतजाम हुआ। उधर बाजा बजना शुरू हो गया था। बाराती खूब नाचे। जब नाच-नाचकर थक गए तो खाने की याद आई। सभी मिठाइयों से मुकाबला करने लगे। नाले वाले हादसे में महफूज बचा बाराती भी पिछली बातें भूल चुका था। बहुत कीमती सूट पहनकर बैठा था। अचानक न जाने कहां से एक लड़का रसगुल्लों का बर्तन लेकर आया। उसे कहीं से धक्का लगा और बर्तन में रखी पूरी चाशनी उस तीसरे बाराती के सिर पर उड़ेल दी।

चादरें खराब करने के बाद अचानक हुईं ये घटनाएं संयोग थीं या हादसा अथवा कोई साजिश, मैं नहीं कह सकता ... लेकिन मैं इन्हें भुला नहीं पाया हूं। आज कुरआन की यह आयत पढ़ी तो वह बारात फिर से याद आ गई और इस आयत का अर्थ भी ज्यादा गहराई से समझ में आ गया।
आयत इस तरह से है-
और धरती पर बिगाड़ न करो, उसके सुधार के बाद और उसी (रब) को पुकारो, भय के साथ और आशा के साथ। निसंदेह रब की कृपा भले काम करने वालों के निकट है। (7/56) सूरह अल-आराफ

इस धरती पर जो भी बिगाड़ करेगा, हमारा रब उसकी हरकतों को कभी पसंद नहीं करेगा। चाहे वह बारात में बदमाशी हो या बम धमाका कर किसी निर्दोष की हत्या, बिगाड़ सिर्फ बिगाड़ है। उसे कोई और नाम भी दे देंगे तो उसका असर खत्म नहीं होगा।



एक अदना-सा मकान मालिक यह पसंद नहीं करता कि उसका किराएदार बिगाड़ के काम करे। फिर हम यह कैसे सोच सकते हैं कि हमारा रब इस धरती पर बिगाड़ करने वालों को खुली छूट दे देगा?
कुरआन की यह आयत स्पष्ट रूप से आतंकवादियों, बदमाशों, दंगाइयों, निर्मम तानाशाहों और सभी के लिए नसीहत है कि सुधर जाएं। कहीं ऐसा न हो कि बाद में सुधरने के लिए मोहल्लत ही न मिले।

यह आयत खासतौर से उन साथियों को पढ़ाएं जिनका मानना है कि कुरआन आतंकवाद सिखाता है। साहब, आतंकवाद तो बहुत दूर की बात है, इस आयत के मुताबिक, अगर मैं किसी के खेत में घुसकर उसे नुकसान पहुंचाने के लिए एक पौधा भी उखाड़ दूं तो वह बहुत बड़ा अपराध है।

हर किस्म का बिगाड़ रब को नापसंद है। चाहे कोई कश्मीरी पंडितों के घर जलाए या बाबरी मस्जिद ढहाए, बर्मा के मुसलमानों का कत्ल करे या अमरीका में 9/11 करवाए। ये सब बिगाड़ के काम हैं जिन्हें न तो इंसानियत पसंद करती है और न इंसान को बनाने वाला खुदा।
- राजीव शर्मा (कोलसिया) -

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