संस्कृत में हो तो पवित्र, जो समझ ना आये वो और भी ज़्यादा पवित्र होता है -काव्याह यादव

सोशल डायरी ब्यूरो
हम फिर आज बेबाक विद्रोही लेखिका काव्याह यादव के बेबाक कलम की कुछ लाइने आपके लिए लाये है. उन्होंने आक्रमणकारी लोगो पर आरोप लगाया है की, वह भारतीय मूलनिवासियो को हजारो सालो से मानसिक गुलाम बनाए हुए है. आईये देखते है काव्याह यादव विदेशी अक्रमंकारियो के बारे में क्या लिखती है.

युद्ध में हारे हुए लोगों को गुलाम बनाना एक बात है लेकिन गुलामों को हमेशा के लिए गुलाम बनाये रखना दूसरी बात है। DNA पीढ़ी दर पीढ़ी बिना किसी बदलाव के स्थानांतरित होता रहता है। आक्रमणकारी लोग हमेशा अल्पसंख्यक होते है और वहां की प्रजा बहुसंख्यक होती है। जब भी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की बात आती है तो आक्रमणकारी लोगों के मन में बहुसंख्यकों के प्रति हीन भावना का विकास होता है। इसीलिए द्विज के मन में मूलनिवासियों के प्रति हीन भावना का विकास हुआ। अब अगर DNA के आधार पर विश्लेषण किया जाये, और इतिहास फिर से ना लिखा जाये तो दुनिया द्विजो को BACKWARD HISTORIAN कहेंगी 



DNA परिक्षण की जरुरत क्यों पड़ी ?
संस्कृत और रूस की भाषा में हजारों ऐसे शब्द है जो एक जैसे है। यह बात पुरातत्व विभाग, मानववंश शास्त्र विभाग, भाषाशास्त्र विभाग आदि ने भी सिद्ध की, लेकिन फिर भी द्विजो ने इस बात को नहीं माना जोकि सच थी।
द्विज भ्रांतियां पैदा करने में बहुत माहिर है, पूरी दुनिया में द्विजो का इस मामले में कोई मुकाबला नहीं है। इसीलिए DNA के आधार पर शोध हुआ। द्विजो का DNA प्रमाणित होने के बाद उन्होंने सोचा कि अगर हम इस बात का विरोध करेंगे तो दुनिया में हम लोग बेवकुफ़ साबित हो जायेंगे।

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“ब्राम्हण जब ज्यादा बोलता है तो खतरा है, ब्राम्हण जब मीठा बोलता है तो खतरा बहुत नजदीक पहुँच गया है और जब ब्राम्हण बिलकुल नहीं बोलता। एक दम चुप हो जाता है तो भी खतरा है। “ ITS CONSPIRACY OF SILENCE- अगर ब्राम्हण चुप है और कुछ छुपा रहा है तो हमे जोर से बोलना चाहिए।

इस शोध का परिणाम यह हुआ कि अब हमे अपना इतिहास नए सिरे से लिखना होगा। जो भी आज तक लिखा गया है वो सब द्विज ने झूठ और अनुमानों पर आधारित लिखा है। 

संस्कृत में हो तो पवित्र होता है। जो समझ ना आये वो और भी ज़्यादा पवित्र होता है । कुछ लोग संस्कृत के हर छन्द को प्रभु प्रार्थना समझते है । ऐसे कुछ लोग उर्दू के हर शेर को हास्यरस का समझते है । शेर सुना और ही ही करने लगे। भाव चाहे करुण हो , " किस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और " वाह-वाह..... तमन्ना .. ही ही ही ही ही ही---- परसाई 
(यह पूर्णतः लेखिका के निजी विचार है)
-काव्याह यादव