रंडी कौन है ... पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल- श्वेता यादव

जिस दिन अमिताभ बच्चन ने अपनी नातिन और पोती को एक भावुक चिट्ठी लिखी थी मन तो उसी दिन हो गया था कि एक पत्र लिखूं बच्चन साहब के नाम और उनसे कुछ सवाल करूं। लेकिन अगले ही दिन पता चला कि दरअसल वो चिट्ठी तो फिल्म पिंक के प्रमोशन का एक हिस्सा थी। फिर मन में आया रूकती हूं पिंक देखती हूं फिर लिखूंगी। 

पिंक की बात करें तो कुछ बातों को छोड़ कर सच में पिंक आज के माहौल के लिए एक जरूरी फिल्म है जिसे सबको देखनी चाहिए। सिर्फ मर्दों को ही नहीं आज की कामकाजी औरतों, लड़कियों और घर के परिवेश में अपमान झेल रही स्त्रियों के लिए भी एक जरूरी फिल्म है पिंक, इसलिए देखना चाहिए सबको। 

बेटी को अपने पिता के साथ, पत्नी को अपने पति के साथ, गर्लफ्रेंड को अपने ब्वायफ्रेंड के साथ देखनी चाहिए पिंक। याद रखिये असली आज़ादी तभी है जब आप ले जाएं सिनेमाघरों तक अपने पुरुष साथी को .. आपका पुरुष साथी आपको नहीं!

मैंने पिंक की कई सारी समीक्षाएं पढ़ी हैं। लगभग हर समीक्षा में यह कहा गया कि फिल्म में कुछ कमियां हैं लेकिन फिल्म इतनी जरूरी है कि उन कमियों को नज़रअंदाज करके फिल्म जरूर देखनी चाहिए। अच्छी बात है फिल्म सच में बेहद जरूरी है लेकिन सोचिए क्या सच में हम अभी भी उसी दौर में जी रहे हैं जहां एक जरूरी फिल्म की कमियों पर बात करने का समय अभी तक नहीं आ पाया है। 

अगर आपका जवाब हां है तो मैं यही कहूंगी की फिर अपने आपको प्रगतिशील और संवेदनशील कह कर खुद को ठगना बंद करिए। क्योंकि अभी आपको अपनी पोंगापंथी से निकलने में बहुत समय है। 




पिंक देखने के बाद मेरे मन में कई सवाल उठे हैं फिल्म को लेकर, समाज को लेकर, बच्चन साहब आपकी चिट्ठी को लेकर। समझ लीजिए कि खुन्नस ही उठी है मेरे मन में। इसके अलावा फिल्म की कमियों को लेकर भी बहुत सारे सवाल हैं मेरे मन में। अपनी बात को आगे रखने से पहले आप सभी पाठकों से मेरा यही अनुरोध है कि इसे सिर्फ एक फिल्म की समीक्षा समझ कर मत पढ़िएगा यक़ीनन आपको निराशा ही हाथ लगेगी।

हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं जहां एक भारत में कई भारत बसते हैं। जाति, धर्म, लिंग की बात अगर अभी छोड़ भी दें तो यहां आर्थिक रूप से भी तीन तरह के भारत हैं। जी हां! तीन तरह के भारत.. 

पहला वो जिसकी कैटगरी में बच्चन साहब आते हैं। जहां आप क्या खाते हैं क्या पहनते हैं वो सब बाकी भारत के लिए फैशन और आधुनिकता के नाम पर अनुकरणीय हो जाता है। क्योंकि आप जो करते हैं वह सामाजिक रूप से यह कह कर स्वीकार्य हो जाता है कि भाई बड़े लोग हैं। दूसरा वो लोग जो आर्थिक रूप से इस हद तक सक्षम तो हैं कि थोड़ा बहुत इन्हें फालो कर सकते हैं लेकिन अपनी परम्परागत रुढियों और सामाजिक मान्यताओं से बाहर नहीं निकल पाए हैं। ये लोग करना तो सब चाहते हैं लेकिन एक दायरे में .. कोई देखे नहीं कोई जाने नहीं टाइप से आखिर इज्जत की बात है। और इनकी इज्जत इनके घर की स्त्रियों की वेजाइना से शुरू होती है और वही पर आकर ख़तम भी हो जाती है। तीसरे वह लोग जो इन दोनों में से किसी को फालो नहीं कर सकते बस देखकर और भी ज्यादा कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।




अब बच्चन साहब मुझे आप यह बताइये कि आप के घर की बच्चियां जींस पहने या गाउन किसकी हिम्मत है कि उन्हें कुछ कहेगा? बल्कि वो जो भी करेंगी बाकी भारतीयों के लिए तो वो फैशन के नाम पर अनुकरणीय हो जाएगा। दूसरी बात यह कि आप अगर इतने ही प्रगतिशील माइंडसेट के हैं.. तो आपको अपने बेटे की शादी से पहले अपनी बहु की शादी किसी पेड़ से करने की जरूरत क्यों पड़ गई? यह मेरी नज़र में दोगलापन है इससे ज्यादा कुछ नहीं। 

तो साहब यह अपना हाई प्रोफाइल ड्रामा बंद करिए, क्योंकि आपको इस देश में बहुत सारे लोग अपना भगवान मानते हैं, क्यों मानते हैं यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया। एक एक्टिंग के अलावा आपकी और क्या उपलब्धि है यह मुझे नहीं पता। क्या है ना कि मेरा जनरल नॉलेज थोड़ा कम है। हां एक उपलब्धि पनामा मामला है और एक गुजरात की खुशबु है ..गुजरात की बदबू तो पत्र भेजने के बाद भी नहीं सूंघ पाए आप।

अब थोड़ी बात पिंक की कमियों पर कर लेते हैं। फिल्म के कई दृश्य अच्छे हैं लेकिन इससे इसकी कमियां नहीं दबाई जा सकती, क्योंकि जब आप यह दावा करते हैं कि आप इस समाज की बुराई को सामने ला रहे हैं तो फिर आपसे यह उम्मीद बढ़ जाती है कि आप इमानदार रहें।

पहली बात तो यह की यह फिल्म तीन लड़कियों के संघर्ष की कहानी है तो इस फिल्म के स्टार कास्ट अमिताभ क्यों हो गए वो लडकियां क्यों नहीं? आप कह सकते हैं की यह फिल्म की कमाई का मसला था। चलिए मान लिया.. पूरी फिल्म में तीन दृश्यों को छोड़ दूं तो बाकि जगहों पर इन लड़कियों को एक तरह के गिल्ट में दिखाया गया है। यहां तक की कोर्ट के सामने भी वो अपने मन की बात डरे सहमें अंदाज में ही रखती हैं। 

ऐसा दिखाना जरूरी था क्या? आप क्या दिखाना चाहते हैं कि बाहर निकलने वाली लड़कियों को अभी भी डर कर रहना चाहिए। इसके अलावा आप ने एक चीज और साबित की .. कि मारेगा भी वही और बचाएगा भी वही। कातिल भी वही, खंजर भी वही, और तो और दवा और तीमारदार भी वही .. गजब! आपको वकील के रूप में भी एक पुरुष ही मिला कोई महिला क्यों नहीं मिली?
   
पिंक फिल्म के एक दृश्य में पुलिसकर्मी लड़कियों से कहता है- आपके  जैसी  अच्छी  लड़कियां.. कहीं जाती हैं ऐसे लड़कों के साथ.. आपके जैसी लड़कियां। करते आप सब हो.. मतलब जाते अपनी मर्जी से हो दारु सारु पीते हो.. और बाद में वो जो फ़ौज है ना पीछे पड़ जाती है हमारे। मतलब मोमबत्ती जलाने लगती हैं कि जी हम सेफ नहीं हैं ...! पूरे संवाद के दौरान इंस्पेक्टर आपके जैसी लड़कियों पर जोर.. हर बार जोर देते हुए अपनी बात कहता है।

कहां से आया है ये शब्द आपके जैसी लड़कियां, क्या मतलब है इस शब्द का। शब्द कहीं आसमान से नहीं टपकते ये हमारी सोच का ही नमूना होते हैं| हम जैसा सोचते हैं वैसे ही हमारे शब्द भी निकलते हैं। शिल्पा शेट्टी ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था “मैं घर पर भंगियों जैसी रहती हूं।” कहने को तो ये सिर्फ एक नॉर्मल शब्द हैं मात्र चंद शब्द जो मजाक में कहे गए। लेकिन क्या वास्तव में यह सिर्फ शब्द है जी नहीं ..भंगी एक पूरा समुदाय है जो सदियों से सिर पर मैला ढोने जैसा काम करने को अभिशप्त है। अब ले जाए कोई शिल्पा जी को और दिखाए की क्या होता है भंगियों का जीवन कैसे रहते हैं वो। यकीन मानिए दोबारा पूरे जीवन शिल्पा शेट्टी भंगी शब्द भूल न गईं तो कहिएगा।




अब कुछ सवाल हमारे सेंसर बोर्ड के सदस्यों से.. साहेबान् आपने फिल्म के लास्ट सीन में राजबीर नामक पात्र के मुहं से निकलने वाले शब्द को सेंसर कर दिया है लेकिन लिप्सिंग रहने दी है जिससे साफ़ समझ में आ रहा है कि वह क्या कहना चाहता है। 

अब मेरा सवाल है- जोर से हंस दिया तो रंडी.. छोटे कपड़े पहन लिया तो रंडी.. किसी लड़के के साथ दिख गई तो रंडी.. किसी अजनबी से अपनेपन से बात कर लिया तो रंडी... रंडी, रंडी, रंडी... हर उस एक बात पर रंडी जो इस समाज के मानकों से परे है.. तो सेंसर बोर्ड जी अब आप ये बताइये की फिर किस हिसाब से आपने इस शब्द को पिंक में सेंसर किया?

"उड़ता पंजाब" में पूरी स्क्रिप्ट में स्टोरी से ज्यादा गालियां हैं, इतनी गालियां कि कानों को चुभने लगती हैं ये थोड़ी देर बाद..। उन्हें आपको सेंसर करने की जरूरत नहीं पड़ी तो फिर इस शब्द को क्यों। "बुद्धा इन ट्रैफिक जाम" में हजार बार फक शब्द का इस्तेमाल हुआ है उसे कहीं भी म्यूट करने की जरूरत नहीं पड़ती ना ही सेंसर करने की। क्यों नहीं पड़ती क्या इसलिए की फक शब्द आपको दूसरी दुनिया में ले जाता है और रंडी यथार्थ में लाकर पटक देता है। 

बहुत सारी फ़िल्में हैं जिनमें मां-बहन को लेकर बनी गालियां खुलेआम दिखाई जाती हैं, कहीं कोई सेंसर नहीं। फिर इस एक शब्द से इतनी आपत्ति क्यों? वैसे यह सच में आपत्ति ही थी या डर कि समाज का नंगा सच यही है जिसे दिखने में आपके भी पसीने छूट गए।

मैं गावं में पली बढ़ी हूं जहां शादी से पहले किसी लड़की का सजना संवरना अच्छा नहीं माना जाता। लिपस्टिक, बिंदी, चूड़ी इनको पहनने का अधिकार सिर्फ शादीशुदा महिलाओं को है। यहां तक कि शादीशुदा लड़कियां जब मायके में आती हैं तो सिर्फ सिंदूर लगाती हैं, वो भी मांग के भीतर छिपाकर.. कि कहीं पिता या भाई को दिखे नहीं। 




मुझे आज भी याद है गांव की महिलाएं और मर्द दोनों ही बड़ी आसानी से उस लड़की को रंडी बोल दिया करते थे जो कि शादी से पहले सजती संवरती हो। खुलेआम ऐसी लड़कियों को लोग कहते थे देखो कैसा रंडियों कि तरह बन ठन कर रहती है। इसे तो भाई-बाप, दुनिया, समाज किसी से भी शर्म लिहाज रह ही नहीं गया है। जोर से हंसना, बोलना या अन्य किसी तरह का काम करने का मतलब रंडी। क्योंकि समाज के हिसाब से ऐसे काम सभ्य घरों की लड़कियां नहीं करतीं। ऐसे स्वछन्द तो सिर्फ रंडियां रहती हैं। कौन हैं ये रंडियां और इन्हें कौन बनाता है?

अब एक सवाल समाज के इन सभ्य ठेकेदारों से... एक बात बताओ ठेकेदारों, जहां तक मुझे पता है भारत में देह व्यापार क्राइम है फिर ये रंडियां आम लड़कियों से रंडियां बन कैसे जाती हैं? कौन है इनका खरीदार? और अगर सच में इनका कोई खरीदार नहीं है तो फिर भारत में देह व्यापार का धंधा इतने बड़े पैमाने पर फल-फूल कैसे रहा है? 

मेरी एक पोस्ट पर अनुपम वर्मा जी ने कमेंट किया था उसे ठीक उसी तरह इस लेख में शामिल कर रही हूं-
“यही होता है! यहां चीखती चिल्लाती उस नंगी सच्चाई को फटी बोरी से ढका जाता है जो हर चौराहे पर खड़ी हुई हो!
चोरी छिपे दाम देकर आदमी जिन गलियों से मुंह छिपा कर निकले....
उन गलियों की आंखो मे आंखे डाल कर बातें करने वाली औरत रंडी !!
बोर्ड मे बैठे हुए दोगले इंसान अधिकार के दम पर वही तय करेंगे जो यहां का रिवाज़ है! कोई जवाब नही है इनके पास श्वेता जी!
यह वो देश है जहां बलात्कार के बाद बलात्कारी के बालिग होने की पुष्टि की जाती है!”
   
कितना यथार्थ है अनुपम की बातों में.. जिन गलियों में रात के अंधेरे में जाने वाला सफ़ेदपोश उन गलियों में रहने वालियों को जन्नत की हूर से कम नहीं मानते, सुबह होते ही वही उनके लिए रंडियां हो जाती हैं।




पूरी फिल्म में इस एक बात को लेकर बहस है कि लड़कियों ने पैसे लिए, इसलिए उनका इनकार कोई मायने नहीं रखता। समूची बहस में दोनों वकील इसी बात को साबित करने में लगे हुए हैं। और अंत में फलक के मुहं से यह कहलाया गया कि “हां हमने लिए थे पैसे, लेकिन पैसे लेने के बाद मीनल का मन बदल गया और उसने नहीं कर दिया” 

अब सवाल यह उठता है कि इस समाज में नहीं सुनने की आदत तो अभी तक पति को भी नहीं है तो एक खरीदार कैसे नहीं सुनेगा? देह व्यापार में ज्यादातर महिलाएं दलित-वंचित तबकों से ही हैं। अपनी मर्जी से इसे अपनाने वाली महिलाओं की बात नहीं कर रही मैं।

इस मामले में मैं वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द शेष से सहमत हूं वह लिखते हैं- यह फिल्म समाज की हाशिए की महिलाओं के लिए एक अमूर्त-सी जगह बनाती भी है तो इस तबके की उन तमाम महिलाओं को अपमानित करती है जो अपनी पसंद या चुनाव की वजह से नहीं, बल्कि अपने खिलाफ एक आपराधिक घटना के तहत देह-व्यापार के त्रासद पेशे में होती हैं। तो क्या यह फिल्म अनजाने में कथित मुख्यधारा की स्त्री-विमर्श की फिल्म के रूप में सिमट कर रह जाती है, जिसमें दलित-वंचित जातियों-वर्गों के सवालों के लिए कोई जगह नहीं है?

मीनल, फ़लक और रिया को बाकायदा क्रमशः 'हिंदू', मुसलिम और पूर्वोत्तर की आदिवासी के रूप में दर्ज किया जा सकता है। तो इनके साथ एक दलित पृष्ठभूमि की लड़की भी होती तो क्या यह फिल्म थोड़ी और पूरी नहीं हो सकती थी? बाजार के दबाव में या दृष्टि के अभाव में अमिताभ बच्चन को उन बहादुर लड़कियों का संरक्षक बना कर क्या दर्शाया गया? लेकिन इन बातों पर गौर करने की दृष्टि और हिम्मत कहां से आएगी? सामाजिक मसलों पर फिल्म बनाते समय थोड़ी-सी हिम्मत और ईमानदारी की जरूरत होती है। यों, इस फिल्म की अहमियत अपनी जगह पर अब भी है। लेकिन पाकिस्तानी फिल्म 'बोल' एक उदाहरण है कि इस्लामी पृष्ठभूमि के बावजूद किसी सामाजिक और खासतौर पर स्त्री प्रश्न को कैसे बेहतरीन तरीके से डील किया जा सकता है। 'बोल' से सीखा जा सकता है।

अंत में सिर्फ इतना ही कहना चाहती हूं, कि जब तक हममें हां को स्वीकारने की हिम्मत नहीं आएगी। जब तक हम किसी महिला को सेक्स के लिए हां करने पर उसके चरित्र को आंकना बंद नहीं करेंगे .. तब तक किसी स्त्री की ना को समझना हमारे लिए मुश्किल ही होगा।

फिल्म की सार्थकता के साथ ही साथ इसकी कमियों पर भी बात जरूरी है तभी हम सही मायने में समाज को समझने और स्त्री को सिर्फ लिंग से परे मानव मानने में सफल हो पाएंगे। अन्यथा यह पोंगापंथ से ज्यादा और कुछ न हो पाएगा कि कुछ हुआ तो छाती पीट ली हाय-हाय कर ली और फिर आगे बढ़ गए। 
(लेखिका एक पत्रकार हैं, यह उनके निजी विचार हैं।)