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अतिनाटकीय है स्त्रीविरोधी है फिल्म 'पिंक'



-संजीव चंदन
वो स्त्री को सिर्फ भोगना चाहते थे, उनका इरादा हत्या करना नहीं था। कितने फैसले बताऊं-गिनाऊं, सौम्या! सुन रही हो 'निर्भया' एंड सिस्टर्स!न्यायविद 
अरविंद जैन का यह फेसबुक स्टेट्स 18 सितंबर को आया, जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा केरल की एक लड़की सौम्या के बलात्कार और ह्त्या के मामले में सजायाफ्ता दोषी को ह्त्या के आरोप से मुक्त कर दिया गया. उसके दो दिन बाद मैं दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में बलात्कार के एक आरोपी की जमानत पर सुनवाई के दौरान गया, जहां दिल्ली और देश की अदालतों की वास्तविक दुनिया है और उसी शाम दिल्ली की एक अदालत में मुकदमा लडे जाने की काल्पनिक कथा देखी ‘पिंक’ फिल्म में.
एक संरक्षक अभिभावक की जद  में सुरक्षित लडकियां, फिल्म का पोस्टर



इस फिल्म को कई लोग वाह –वाह की शैली में देख रहे हैं, कई इसे स्त्री देह पर उसके अधिकार के तहत उसे ‘नो’ कहने के हक़ को सशक्तता से फिल्माने वाली फिल्म बता रहे हैं. कई इसे गंभीर स्त्रीवादी भी बता रहे हैं. स्वाभाविक है, इस फिल्म को इन्हीं मापदंडों पर देखना चाहिए, बाजार के किसी षड़यंत्र को सूंघे बिना कि वह हर ‘मामले’ ‘हक़’, ‘नारे’ और लड़ाई को इस्तेमाल करने में लगा है. चूकी इस फिल्म के  कथानक का उद्देश्य महिलाओं के ‘ नो’ कहने के अधिकार का पक्ष प्रस्तुत करना है, और समाज को ऐसा ही सन्देश देना है, इसलिए यह एक प्रेसक्रिप्टीव फिल्म है, डिसक्रिप्टीव नहीं.  कथानक के उद्देश्य के प्रगतिशील, जरूरी और पावरफुल होने पर कोई सवाल नहीं हो सकता- यही इस फिल्म की ताकत है, जो दर्शकों को अपने साथ बहा ले जाता है. सवाल है कि इस बहाव के साथ क्या स्त्रियों के संघर्ष सुरक्षित रह जाते हैं, क्या ‘नो’ कहने की भावना को मजबूती मिलती है? 

इस फिल्म को समझने के पहले, इस पर बात करने के पहले स्त्री आन्दोलनों के द्वारा स्त्री पर यौन हिंसा के मामले में हासिल स्त्री अधिकारों को ध्यान में रख लें: 
1.    महिलाओं ने लम्बे संघर्ष के बाद 8वें दशक में ही यह अधिकार हासिल किया कि यौन हिंसा के मामले में ओनस ऑफ़ प्रूफ ( सिद्ध करने की जिम्मेवारी) अभियुक्त की होगी. 
2.    उन्हीं वर्षों में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी आया कि सेक्स व्यापार में जुडी महिला को भी अनचाहे सेक्स पर ना कहने का अधिकार है.
3.    ९वे दशक तक क़ानून सम्मत हो गया कि बलात्कार के मामले में पीडिता के चरित्र पर ट्रायल के दौरान सवाल नहीं किये जायेंगे-उसे आधार नहीं बनाया जायेगा. 


ये क़ानून पितृसत्ता से संघर्ष करते हुए महिलाओं के बड़े हासिल हैं. यदि आज कोई भी महिलाओं के अधिकार के प्रति संवेदनशील होगा तो वह पितृसत्ता को कमजोर करने का टार्गेट इससे आगे का फिक्स करेगा, न कि आज की तारीख में मिले अधिकार को दरकिनार कर, उनकी उपेक्षा कर या जानबूझकर भूलकर. ऐसा करते हुए स्त्रियों के खिलाफ वह जाने –अनजाने पितृसत्ता के एजेंट की भूमिका में ही होगा. सवाल यह है कि लम्बे संघर्षों से कानूनी हासिल अधिकार को दरकिनार कर कोई कथानक पीड़िताओं के एक ऐसे अवास्तविक यथार्थ में ले जाता है, जहां उन्हें मुंह खोलने या लड़ने की कीमत के तौर पर कोर्ट के स्त्रीविरोधी वातावरण से गुजरना जरूरी बताया जाता हो, वहाँ पीडिता लड़ने की साहस करेगी, या डर जायेगी !  जबकि 2016 तक का यथार्थ है कि कानूनन ऐसी स्थितियां पीडिता के खिलाफ नहीं होती हैं, कानून बहुत हद तक पीडिता को न्याय हासिल करने का वातावरण बनाता है- उसे अब दो-तीन दशक पहले जैसा चरित्रहीन बताने की कोशिश नहीं हो सकती- जज उसे रोकने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है. एक सेकेण्ड भी कोर्ट रूम में वैसा ट्रायल नहीं चल सकता, जो फिल्म में दिखाया गया है.




अब समझते हैं फिल्म को उसके कथानक, फिल्मांकन, दृश्यों के माध्यम से. 

1.    तीन अति आधुनिक,  एक हद तक पढी-लिखी आत्मनिर्भर लडकियां अपनी मर्जी से कुछ लड़कों के साथ पार्टी में जाती हैं-स्वाभाविक है वहाँ ड्रिंक और डीनर होगा. लड़के उन लड़कियों से जोर-जबरदस्ती करते हैं, लडकियां अपने बचाव में एक लड़के के सर पर बोतल से प्रहार करती हैं और भाग जाती हैं. इस साहसिक कदम के बाद लडकियां डर जाती हैं कि आगे क्या होगा? कायदे से वे लड़कियां उस लड़के की जान भी ले सकती थीं अपने बचाव में और क़ानून ऐसा करने की इजाजत भी देता है. लेकिन उनपर डर हावी हो जाता है, स्वाभाविक भी है, यह डर समाज का, अनावश्यक क़ानून के पचड़ों ( क्या क़ानून पचड़ा है, हालांकि फिल्म वास्तव में यही सिद्ध कर देती है !) से बचने का, डरों के ऐसे सीरीज हैं- लड़कियों के मामले में. लडकियां अंत तक डरी रहती हैं, क़ानून के तौर पर अनपढ़ सा व्यवहार करती हैं, एक बार वकील का प्रोफाइल जानने के लिए गूगल करने के अलावा क़ानून की जानकारियों के लिए कभी गूगल तक नहीं करतीं – पूरी तरह एक सनकी बूढ़े वकील (अमिताभ बच्चन) पर निर्भर होती जाती हैं, जो इस घटना के न घटने तक , इसकी जानकारी न होने तक उन्हें घूरता रहता है, पार्क में बालकनी में, इस घूरने से लड़कियां नाराज भी होती हैं, लेकिन जैसे ही हमेशा आक्सीजन मास्क लगाये उस सनकी बूढ़े से एक रहनुमा वकील, निकलता है, उसका घूरना निगरानी में तब्दील हो जाता है- एक पैट्रीआर्क की निगरानी, जो लड़कियों को दृश्य-अदृश्य संरक्षण में रखता है.

मस्ती के मूड  में फिल्म के कलाकार



2.    उन लड़कियों के बचाव में कोई काबिल महिला वकील नहीं आती है, शायद वह आती तो उन्हें कोर्ट रूम के अनावश्यक जिरह, चरित्र के लिए गैरकानूनी जिरह से गुजरने से बचा ले जाती. क़ानून की एक महिला रखवाला (रखवाला पद पर नियुक्त) जरूर इस कथानक में है, लेकिन पूंजी और सत्ता से संचालित तथा लड़कियों के विरूद्ध षड्यंत्र में शामिल. वकील पुरुष है यानी मार्केट से पैसा लूटने वाले स्टार छवि के अमिताभ बच्चन और लड़कियों को प्रताड़ित करने वाली एसएचओ है महिला- क्या यह चुनाव भोला चुनाव भर है, या कोई सचेत चुनाव, क्योंकि यह फिल्म अंततः एक प्रेसक्रिप्टीव फिल्म है- ‘नो’ कहने के अधिकार के पक्ष में. 

3.    लड़के लड़कियों को डराते हैं,  एक लडकी को कार में ले जाकर दुबारा मोलेस्ट करते हैं, लडकियां तब जाकर यह साहस कर पाती हैं कि वे लिखित शिकायत दर्ज करें, इसके पहले अति जागरूक दिल्ली की आधुनिक पढी–लिखी लडकियां एक बार थाने तो जरूर जाती हैं, लेकिन इन्स्पेक्टर की मीठी धमकी से डर जाती हैं- समझ में नहीं आता कि कथानक यहाँ कौन सा स्त्रीवादी सन्देश देना चाहता है! 

4.    इसके बाद लडकियों में से एक 7 दिन पहले लड़कों पर किये गए हमले के आरोप में गिरफ्तार हो जाती है.फिर तो पहाड़ टूट पड़ता है, उनपर.  वे असहाय हो जाती हैं इस 24 घंटे खबरिया चैनल के खबर पिपासु समय में भी.  कोई वकील तक उनके लिए खडा नहीं होता, तब तक जब तक अमिताभ बच्चन, धारा 320,324,307 आदि को दुहरा कर कानूनी रूप से निरक्षर दर्शकों और कथानक के भीतर की लड़कियों को अपने ज्ञान प्रभाव में नहीं ले लेते हैं, इसके बाद उद्घाटन करते हैं कि इन धाराओं में लड़कियों और बच्चों को आसानी से जमानत का प्रावधान है. 

5.    इसके बाद कोर्टरूम का अतिनाटकीय, स्त्री आन्दोलनों से हासिल अधिकार से पीछे ले जाने वाला दृश्य शुरू होता है. एक उदार सा सेशन जज कुर्सी पर बैठा है, जो थाने से लेकर गवाह तक के खरीद लिये जाने के माहौल में इकलौता ईमानदार जज है, ईमानदार वकील साहब से युगलबंदी के लिए. जिसे पिछले दशकों में महिलाओं को हासिल अधिकार का एबीसी नहीं पता है. वह अपने  कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है. और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों,  यानी लड़कियों को यह नहीं सीखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है. 

शूटिंग से



6.    कुछ वकील वाले और कुछ जासूस वाले अंदाज में लड़कियों के वकील कोर्ट के सामने यह सिद्ध कर देते हैं कि लड़कियों के खिलाफ मुकदमा 7 दिन बाद 7 दिन पहले के डेट में दायर किया गया था, स्टेशन डायरी के आधार पर और कुछ जासूसी फोटोग्राफ के आधार पर वे ऐसा सिद्ध करते हैं. ऐसा सिद्ध करने की काबिलियत एक नौसिखिया वकील या स्टेशन डायरी के आधार पर क्राइम रिपोर्ट बनाने वाला लोकल पत्रकार में भी हो सकती है. सवाल है कि जब कोर्ट के सामने यह तथ्य ला दिया गया, और एसएचओ की चालाकियां पकड़ी गई तो यह केस वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था और एसएचओ को निलंबित करने का आदेश जारी हो जाना चाहिए था. यथार्थ में ऐसा ही होता, ऐसा होने से एक वास्तविक स्त्रीवादी बढ़त मिलती- मुकदमा नये सिरे से दर्ज होता, इस बार आरोपी बलात्कार के प्रयास और अन्य धाराओं के आरोपी  होते और निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेवारी लड़कियों से शिफ्ट होकर लड़कों पर हो जाती- इसके लिए बहत पसीना बहाया है स्त्रियों ने, इस अधिकार को हासिल करने के लिए- ओनस ऑफ़ प्रूफ की शिफ्टिंग कराने के लिए. एक और स्त्रीवादी मोड़ आता कथानक में ट्रायल ऑन कैमरा हो जाता, लडकियों के चरित्र की खाल उतारने की नाटकीयता का अवसर ख़त्म हो जाता. ऐसा कुछ नहीं होता है और मुकदमा चलता रहता है. 

7.    इसके बाद बारी आती है संरक्षक वकील साहब की अन्य जासूसी कार्रवाइयों की और उनकी नाटकीयता की. वे आरोपियों की बहन की शराब पीते तस्वीर लेकर आते हैं, आरोपी को दिखाकर क्रोधित करते हैं- है न यह खाप पंचायतों वाला स्त्रीवाद- ‘शराब पीने के लिए यदि तुम और तुम्हारा वकील मेरी मुवक्किलों को जलील कर सकते हो, तो लो मैं भी शराब पीने वाली तुम्हारी बहन को जलील कर लेता हूँ- क्योंकि उद्देश्य पवित्र है, ‘बेचारी लड़कियों को बचाना, और जनता को ‘नो’ कहने का अधिकार सीखाना- यह कौन सा स्त्रीवाद है, यह दिमाग पर बहुत जोर देकर भी मैं नहीं समझ पाता!  

8.    और अंत तक यह भी नहीं समझ पाता कि इस ‘नो कहने’ के अधिकार को पीछे खीच कर ले जाने वाला वकील इस फिल्म का नायक है, या वे लडकियां जो ‘नो’ कहने का साहस कर फंस गईं - इस कदर की जिन ट्रायलों से उनकी पिछली पीढी ने उन्हें मुक्त करा दिया था,  बॉक्स ऑफिस पर कैश बटोरने की फिल्मकार की मुहीम के लिए उन्ही ट्रायलों में दुबारा फंस ज़ाती हैं. और फंस जाती हैं एक ऐसे संरक्षक अभिभावक -पैट्रीआर्क के संरक्षण में, जिसकी स्त्री -कानून की समझ की  सूई सातवें दशक में ही अटक गई है. 




एक मजबूत और जरूरी कथन पर लिखी गई एक कमजोर, गैरजिम्मेवाराना, और संवेदनहीन कथानक वाली फिल्म है ‘पिंक’, जिससे पूरी फिल्म अन्ततः स्त्रीविरोधी हो जाती है. स्त्री के पक्ष में यह फिल्म तब होती, जब यह बताया जाता कि ‘इस नो’ कहने के अधिकार के लिए कानूनी रूप से लडकियां कहाँ-कहाँ मजबूत हैं. कोर्ट–कचहरी का भयावह, यथार्थ से रहित काल्पनिक दृश्य पैदा करके लड़कियों को डराया ही गया है- इससे साधारण मानस जो रिसीव करता है, उसका ही परिणाम है कि कोर्ट-कचहरी से बचने के लिए कोई नागरिक किसी महिला को सडक पर मारा जाता हुआ देखता है और चलता बनता है. 

हालांकि इस फिल्म के नारे ‘नो कहने के अधिकार’ में इतनी ताकत है कि इस लचर फिल्म के प्रभाव में आ जाने के खूब अवसर हैं. फिल्म देखने के बाद अपनी त्वरित प्रतिक्रया में मैंने फेसबुक पर जब एक पोस्ट लिखा तो इसपर पक्ष-विपक्ष की पावरफुल टिप्पणियाँ भी आयीं. इस आलेख में उनके स्क्रीनशॉट और पोस्ट को यथावत शामिल कर रहा हूँ. 


एक अच्छी थीम पर बकवास और स्त्रीविरोधी फिल्म 'पिंक'

कल रियल दुनिया मे, यानी 20 सितम्बर को पटियाला हाउस कोर्ट में, एक काबिल और कमिटेड ऐडवोकेट वृदा ग्रोवर को 'बलात्कार' के केस मे अभियुक्त की जमानत याचिका खारिज किये जाने की असफल गुजारिश करते देखने के बाद रील की दुनिया में यानी 'पिंक' फिल्म में एक अति नाटकीय वकील को अपने मुवक्किलों ( पीड़ित लड़कियों) को जमानत दिलावाते हुए और केस जितवाते हुए देखा. फर्क जजों में भी था- पटियाला हाउस कोर्ट का जज जमानत पर निर्णय के लिए चार्जशीट दाखिल तक का इंतजार कर रहा है, यानी अधिकांश स्थिति में वह अभियुक्त को जमानत देने ही वाला है, जबकि उसे जेल में होना चाहिए -कानूनन भी. लेकिन फिल्म का जज हाव भाव से लडकियों के पक्ष में' दयालू, और ईमानदार' दिखता रहा- जिसे निर्णय वही देना था, जो उसने फिल्म के आखिर में दिया.



रियल और रील का यह फासला फिल्म के साथ और बढ़ता ही जाता है, जिससे अंततः इस निष्कर्ष पर मैं पहुंचता हूँ कि बिना शोध के कोई फिल्म यदि बनाई जायेगी तो वह 'पिंक' जैसी कानूनी रूप से भ्रमित करने वाली फिल्म बनेगी और अंततः स्त्रीवाद की की कसौटी पर कसकर स्त्रीविरोधी भी. अतिउत्साही फिल्मकार ने बड़ी मुश्किल से 'ओनस' ऑफ़ प्रूफ के शिफ्ट हो जाने से लड़कियों को मिले अधिकार और राहत की ऐसी तैसी कर दी है ।इसके लिए महिला आन्दोलन ने बड़ी लडाइयां लड़ी है- मथुरा रेप केस से लेकर आगे तक. फिल्म देखने वाला नौसिखिया क़ानून का जानकार या थाने की डायरी पर निर्भर ' क्राइम पत्रकारिता' करने वाला पत्रकार भी जिस बात को शुरू में ही क्रैक करके लड़कियों को न्याय दिलवा सकता है, उसे वकील के रूप में अमिताभ बच्चन बड़े नाटकीय ढंग से क्लाइमेक्स तक बचाए रखते हैं- यानी बैक डेट में स्टेशन डायरी में केस की इंट्री. और जैसे ही यह गुत्थी सुलझती , केस ही खारिज हो जाता तो फिर फिल्म कैसे चलती भला (!) रियल दुनिया में दो अलग-अलग मुक़दमे चलते और अलग-अलग गिरफ्तारियां होतीं- दोनो पक्षों की, लडकियां पहले छूट जातीं-लड़के यानी बलात्कारियों को मुश्किलें होतीं. लेकिन दोनो मामलों के काकटेल से एक बड़े ही उदार सेशन जज के कोर्ट में 70-80 के दशक की नाटकीयता के साथ ' स्त्रीविमर्श' फिल्माने की नौटकी का नाम है पिंक- जिसे कुछ एनजीओ और स्त्री अधययन के सिरफिरे अध्यापक शायद स्पेशल स्क्रीनिंग के साथ देखे और दिखाएँगे.

यह लड़कियों के लिए 'ना कहने के अधिकार' जैसी बहुत जरूरी और अच्छी थीम पर एक बकवास फिल्म बनाई गई है और अंततः स्त्रीविरोधी भी. इत्मीनान से और भी लिखूंगा. लेकिन जाते-जाते एक बात और कह दूं कि फेसबुक पर साहित्य और फिल्मों को को समझने -समझाने का जो ' मैगी स्टाइल' - ' दो मिनट वाला तरीका' है- वह पैसा, समय, कल्पना और सरोकारों सबको नुकसान पहुंचाता है. 
वकील साहब आप तो फिल्म ना ही देखें .... (स्त्रिकाल से साभार)

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