यूपी चुनाव: ओवेसी साबित होंगे पोलिटिक्स मिसाईल

आजमगढ़. सपा रार से परेशान है और बसपा में भगदड़ मची हैं, कांग्रेस जमीन तलाश रही है। यह समय एआईएम यूपी फतह के सपने को साकार करने के लिए बेहतर अवसर दिख रहा है। कारण कि उसे पता है कि यूपी के मुसलमान बीजेपी के साथ जायेंगे नहीं और सरकार उसी की बनेगी जिसके साथ वे खडे होंगे।
          हाल में सपा सरकार द्वारा ओवैसी को कार्यक्रम से रोकने और विभिन्‍न जिलों में हुई सांप्रद‍यिक हिंसा की घटनाओं ने कहीं न कहीं मुलमानों की नाराजगी सरकार से बढ़ी है और ओवैसी इनके बीच पैठ बनाने में सफल रहे हैं। खासतौर पर पूर्वांचल के युवा वर्ग में ओवैसी का क्रेज साफ दिख रहा है।



गौर करें तो पिछले दो दशक में पूर्वांचल में बेहतर प्रदर्शन करने वाली पार्टी ही यूपी के सत्‍ता पर काबिज हुई है। यहां दो दर्जन से अधिक विधानसभा सीटों पर हार जीत तय करने वाले मुस्लिम मतदाता जिस पार्टी से जुड़े हैं वह बेहतर साबित हुई है। बसपा ने 2007 के चुनाव में मुस्लिम और दलित मतदाताओं को जोड़कर ही सूबे की सत्ता पर कब्जा कर लिया था। 2012 में मुलायम सिंह ने मुसलमानों को पक्ष में किया और बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने में सफल हुए। 
          अब मुलायम परिवार में सत्ता का संघर्ष चल रहा है। चाचा , भतीजा, पिता पुत्र आपस में लड़ रहे हैं। फिर से मुख्यमंत्री बनने का अखिलेश यादव का सपना टूटता नजर आ रहा है। मुस्लिम मतदाता तय नहीं कर पा रहे हैं की वे सपा के साथ रहें या बसपा के साथ जाएं।



सपा की रार का फायदा अब एमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी उठाने की कोशिश में जुट गए हैं। जल्द ही वे सूबे में धुंआधार रैलियां करेंगे। पश्चिम और पूर्वांचल के मुस्लिम बाहुल्‍य इलाकों के लिए पार्टी द्वारा विशेष योजना तैयार की गयी है। 
पार्टी घर-घर तक पहुंच बनाने के लिए कैडर तैयार कर रही है। एमआईएम मुखिया अल्पसंख्यक समुदाय के हितों को लेकर मुखर रहे हैं ऐसे में असमंजस की स्थिति से गुजर रहे मुस्लिम मतों को वे आसानी से अपने पक्ष में कर सकते हैं। इसके लिए एमआईएम के पदाधिकारी व्यापक रणनीति बनाने में जुट गए हैं। अगर एमआईएम व्यापक रणनीति बनाकर मैदान में उतरी तो निश्चित रूप से मुस्लिम मतों को अपने पक्ष में मोड़ने में सफल होगी। अगर ऐसा हुआ तो सूबे की राजनीति में ओवैसी की भूमिका अहम होगी।