“तीन तलाक़ ‘सती प्रथा’ नहीं है जो पहले धर्म का हिस्सा थी और अब धर्म से बाहर है” – शरीफ खान

अल्लाह ने इंसान को पैदा करने के साथ उसमें से ही उसका जोड़ा भी बनाया ताकि दोनों के मिलन से नस्ल चले।
कुरआन पाक में अल्लाह ने फ़रमाया है:
“और उसकी निशानियों में से एक यह है कि उसने तुम्हारे लिये खुद तुम्ही में से जोड़े पैदा किये हैं ताकि उनके पास सुकून हासिल करो और उसने तुम्हारे दरमियान मोहब्बत और रहमत पैदा की।” अल क़ुरआन (सूरह रोम, आयत 21)
इस प्रकार नस्ल चलाने के लिए केवल महिला पुरुष का मिलन ही काफ़ी न होकर उनमें परस्पर प्रेम भी रखा ताकि एक दूसरे से सुकून हासिल करें। इसके लिये निकाह की पाबन्दी रख दी गई ताकि परिवार वजूद में आए और इन परिवारों से एक आदर्श समाज का निर्माण हो। पति पत्नी का सम्बन्ध किस तरह का हो, उसको कुरआन पाक में अल्लाह ने फ़रमाया है:



“वह तुम्हारी लिबास हैं और तुम उनके लिबास हो।” अल क़ुरआन (सूरह बक़रह, आयत 187)
अर्थात जिस तरह लिबास जिस्म की ज़ीनत, उसके ऐबों को ढकने वाला और उसकी सुरक्षा करने वाला होता है उसी तरह पति पत्नी का सम्बन्ध होता है।
निकाह की बात करें तो यह किसी प्रकार का बन्धन नहीं है कि जैसा भी है इसको निभाना ही पड़ेगा चाहे हर समय पति पत्नी में कलह होता रहे और न ही पत्नी यह प्रण करके डोली में बैठ कर पति के घर में प्रवेश करती है कि अब इस घर से उसकी अर्थी ही निकलेगी बल्कि यह तो एक समझौता है जो साथ साथ रहते हुए आपस में मोहब्बत और सुकून के साथ नस्ल चलाने व उसकी बेहतरीन परवरिश के मक़सद से किया जाता है और यह तसव्वुर भी ज़ेहन में रहता है कि आपस में एक दूसरे की ज़ीनत बन कर रहेंगे, एक दूसरे की कमियों पर पर्दा डालेंगे तथा एक दूसरे की सुरक्षा करेंगे। पति पत्नी की सुरक्षा करेगा और पत्नी पति के माल और अपने अख़लाक़ की सुरक्षा करेगी।


इस प्रकार पति पत्नी के बीच यदि किसी बात पर तनाव पैदा होता है या उनके मिज़ाज नहीं मिलते हैं या किसी भी कारण वश साथ रहना कठिन हो रहा होता है तो ऐसे हालात में बजाय रिश्ते को घसीटने के इस्लामी शरीयत ने दोनों में जुदाई का प्रावधान भी रखा है जिसके अन्तर्गत पत्नी अपनी मेहर के एवज़ में या जैसे भी तय हो जाए पति से जुदाई हासिल कर सकती है जिसको ख़ुला कहते हैं। पति यदि जुदा होना चाहे तो उसको तलाक़ का अधिकार दिया गया है जिसके लिये ज़बान से तीन बार तलाक़ देना ज़रूरी है। चूँकि पति के अधिकार से सम्बन्धित क़ुरआन पाक की सूरह बक़रह में फ़रमाया गया है कि उसके हाथ में अक़दे निकाह (निकाह की गांठ) है लिहाज़ा तलाक़ देने का हक़ भी पति को ही दिया गया है किसी अदालत को इससे दूर रखा गया है।
एक हदीस में नबी (स अ व) का इरशाद है कि:
“अल्लाह तआला के नज़दीक हलाल चीज़ों में सबसे ज़्यादा नापसन्दीदा चीज़ तलाक़ है। शादियां करो और तलाक़ न दो, क्योंकि अल्लाह तआला मज़े चखने वालों और मज़े चखने वालियों को पसन्द नहीं करता।”


इस तरह तलाक़ देना अगर ज़रूरी हो गया हो तो पति को चाहिए कि जब उसकी पत्नी की माहवारी न चल रही हो तब एक बार तलाक़ दे और पत्नी को अपने घर में ही रहने दे ताकि दोनों में दोबारा प्रेम भाव पैदा होने की सम्भावना बनी रहे इसकी अधिकतम मुद्दत तीन माह है अगर इस अन्तराल में स्थिति वही रहती है तो पति एक माह गुज़रने के बाद से तीन माह के अन्दर दोबारा तलाक़ दे सकता है और इस तरह भी अगर अधिकतम तीन माह के अन्दर दोनों में मेल नहीं होता है तो पति को तीसरी तलाक़ देनी चाहिए। यही क़ुरआन में तरीक़ा बताया गया है।
कुरआन पाक में अल्लाह ने फ़रमाया है:
“तलाक़ दो बार है, फिर या तो सीधी तरह औरत को रोक लिया जाए या भले तरीक़े से उसको रुख़सत कर दिया जाए।” अल क़ुरआन (सूरह बक़रह, आयत 229)
अर्थात दो तलाक़ के बाद तय शुदा मुद्दत ग़ुज़रने पर तीसरी तलाक़ देनी लाज़मी हो जाती है।
एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उपरोक्त के ख़िलाफ़ अमल करते हुए यदि पति एक साथ तीन तलाक़ दे देता है तो तलाक़ बेशक हो जाती है लेकिन अल्लाह की नाफ़रमानी का गुनाह उस पर पड़ता है जो कि हदीसों से साबित है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (र अ) ने अपनी पत्नी को माहवारी के दौरान एक तलाक़ दे दी और जब उन्होंने अल्लाह के रसूल (स अ व) को यह बात बताई तो आप (स अ व) बहुत नाराज़ हुए और फ़रमाया कि वापसी कर लो और जब उसकी माहवारी का समय बीत जाए तब तलाक़ देना। इसके बाद उन्होंने अल्लाह के रसूल (स अ व) से यह पूछा कि अगर मैं उसको तीन तलाक़ दे देता तो क्या मुझे वापसी का हक़ रहता? इसके जवाब में आप (स अ व) ने फ़रमाया कि, “नहीं वह जुदा हो जाती और यह गुनाह होता।”


इस तरह एक साथ तीन तलाक़ देने से तलाक़ तो हो जाता है लेकिन ऐसा अमल करने वाला शख़्स गुनाहगार होता है और हज़रत उमर (र अ) जब ख़लीफ़ा थे तो उन्होंने ऐसे मामलों में तलाक़ की तसदीक़ के साथ ऐसे लोगों को कोड़े मारने की सज़ा भी दी थी। इसकी मिसाल बिलकुल ऐसी है जैसे अदालत किसी मुलज़िम को जुर्म साबित हुए बिना जानबूझ कर फांसी की सज़ा सुना देती है लेकिन फ़ैसला ग़लत होने के बावजूद भी बेगुनाह को सरकार फांसी दे देती है क्योंकि फ़ैसला देने का हक़ अदालत को था हलांकि उसने उसका ग़लत इस्तेमाल किया था। अन्त में यह जान लेना भी ज़रूरी है कि इस प्रकार के ख़ालिस इस्लामी शरीयत से सम्बन्धित मामलों के फ़ैसले मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक़ ही तय होने चाहिएं और किसी ग़ैर इस्लामी अदालत को न तो इनमें दख़ल देने का हक़ है और न ही ऐसे मामलों में उन अदालतों का दरवाज़ा खटखटाना जायज़ है।
कुरआन पाक में अल्लाह ने फ़रमाया है:
“ऐ नबी! तुमने देखा नहीं उन लोगों को जो दावा तो करते हैं कि हम ईमान लाए हैं, उस किताब पर जो तुम्हारी तरफ़ नाज़िल की गई है और उन किताबों पर जो तुम से पहले नाज़िल की गई थीं, मगर चाहते यह हैं कि अपने मामलों का फ़ैसला कराने के लिए ताग़ूत की तरफ़ रुजूअ करें, हालांकि उन्हें ताग़ूत से कुफ़्र करने का हुकुम दिया गया था।” अल क़ुरआन (सूरह बनिसा, आयत 60)
यहां ताग़ूत ग़ैरइस्लामी अदालतों को कहा गया है।
इस प्रकार हक़ीक़त यह है कि चूँकि इस्लामी नियम और क़ायदे अल्लाह की तरफ़ से हैं और अल्लाह के रसूल स अ व ने उनको समझाया है लिहाज़ा उनमें किसी तबदीली की गुंजायश नहीं है क्योंकि इस्लामी शरीयत तो क़यामत तक के लिये है और इसमें ऐसा नहीं है जैसे सती करने की प्रथा पहले धर्म का हिस्सा थी और अब धर्म से बाहर कर दी गई है।

-शरीफ खान
 (शरीफ खान फेसबुक यूज़र हैं। यह लेख उनकी टाइम लाइन से लिया गया है। इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी  https://socialdiary24.blogspot.com   स्वागत करता है ।)