पलभर का खेल नहीं तलाक-तलाक-तलाक, 3 से 10 महीने का है प्रोसीजर

अस्सलाम वालेकुम
pease and mercy all of you
फिलहाल सोशल मीडिया और मीडिया में तलाक का मुद्दा जोरो-शोर से उछाला जा रहा है. और इस्लाम के दुश्मन तलाक को मजाक बनाए हुए है. और तलाक की जानकारी नहीं रखने वाले लोग भी तलाक के मुद्दे पर बड़ी बड़ी बहस करने लगे है. और फेसबुकिया ज्ञान बांटने लगे है. जो गैरमुस्लिम बुद्धिजीवी लोग है वह सोच में पड़े है की, तलाक है क्या. और कई गैरमुस्लिम भाइयो को इसके बारे में जानकारी ना होने से वह इस मुद्दे पर कनफूजन में है. इसलिए हमने सोचा क्यों ना हम आज तलाक के बारे में जानकारी दी जाए....... 

यूँ तो तलाक कोई अच्छी चीज नहीं है. इस्लाम में यह चीज नापसंद की जाती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं की, तलाक का हक़ इंसान से छीन लिया जाए. पति पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा हो तो अपनी जिंदगी जहन्नुम बनाने से बेहतर है की वह अलग हो कर अपनी जिंदगी का सफ़र अपनी मर्जी से पूरा करे. जो की इंसान होने के नाते उनका पूरा हक़ है. इसीलिए दुनियाभर के कानून में तलाक की गुंजाईश मौजूद है. और इसीलिए पैगम्बरों के दिन (मजहब) में भी हमेशा से तलाक की गुंजाईश रही है. किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसीकी यह कोशिस होनी चाहिए की जो रिश्ते की डोर एक बार बांध जाए वह आसानी से टूटने ना दे.

जब किसी पति पत्नी का झगडा बढ़ता दिखाई दे तो अल्लाह ने उनके करीबी रिश्तेदार को उनका भला चाहने वालो को यह हिदायत दी है की, आगे बढे और मामले को सुधारने की कोशिस करे. और इसका तरिका कुरआन ने यह बतलाया है.

"एक न्याय करने वाला पति के खानदान से चुने करे और एक न्याय करने वाला पत्नी के खानदान से चुने करे. और दोनों जज मिलकर पति-पत्नी में सुलह कराने की आखिर तक कोशिस करे. इससे उम्मीद है की जिस झगडे को पति-पत्नी मिलकर ना सुलझा सके उस झगडे को खानदान के बुजुर्ग सुलझा सकेंगे."




कुरआन का बयान
और अगर तुम्हे शोहर बीबी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हाकिम (न्यायाधीश) शोहर के लोगो में से और एक हाकिम (न्यायाधीश) बीवी के लोगो में से मुक़र्रर (नियुक्त) कर दो, अगर शोहर बीवी सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बिच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सबकुछ जानने वाला और सबकी खबर रखने वाला है" (सुरह अन-निसा-35)

इसके बावजूद भी अगर शोहर बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है तो शोहर बीवी के ख़ास दिनों (Menstruation) के आने का इन्तेजार करे, और ख़ास दिनों के गुजर जाने के बाद जब बीवी पाक हो जाए तो बिना हम-बिस्तर हुए कम से कम दो जिम्मेदार लोगो को गवाह बनाकर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानी शोहर बीवी से सिर्फ इतना कहे की, "मैं तुम्हे तलाक देता हूँ".

तलक हर हाल में एक ही दी जायेगी दो तिन या सौ नहीं. जो लोग जिहालत की हदे पार करते हुए दो तिन या सैकड़ो तलाक बोल देते है यह इस्लाम के बिलकुल खिलाफ है. पैगम्बर मुहम्मद (स.) के अनुसार जो लोग ऐसी हरकते करते है वह इस्लामी कानून का मजाक उड़ा रहा होता है.

एक तलाक के बाद बीवी तिन महीने तक या प्रेग्नेंट हो तो बच्चा होने तक (तिन महीने के वक्त को इद्दत कहा जाता है) शोहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी पति के ही जिम्मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर एजी रहेंगे. कुरआन ने सुराः तलाक में हुक्म फरमाया है की, इद्दत (तिन माह) पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वह खुद निकले. इसकी वजह कुरआन ने यह बताई है की, इससे उम्मीद है की, इद्दत (तिन माह) के दौरान शोहर बीवी में सुलह हो जाए और तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाए.

अक्ल की रौशनी इ अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए तो पता चलेगा की, इस तरीके में बहुत अच्छी हिकमत (आइडियोलॉजी) है. हर समाज के बिच आग भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही है. अगर बीवी तलाक होते ही मायके चली जाए तो ऐसे लोगो को दोने तरफ कान भरने का मौक़ा मिल जाएगा. इसलिए यह जरुरी है की, बीवी इद्दत का वक्त अपने शोहर के घर ही गुजरे.

"अगर शोहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए तो फिरसे वह दोनों बिना कोई रस्म किये शोहर-बीवी की हैसियत से एक साथ अपनी जिंदगी गुजार सकेंगे. इसके लिए सिर्फ उन्हें इतना ही करना होगा की, जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी उनको खबर कर दे की, हमने अपना फैसला बदल लिया है. कानून में इसे ही रुजू करना कहते है. और यह जिंदगी में दो बार किया जा सकता है इससे ज्यादा नहीं. (सुरह नूह- 229)

शोहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शोहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा. लिहाजा कुरआन ने यह हिदायत दी है की, इद्दत अगर पूरी होने वाली है तो शोहर को यह फैसला कर लेना चाहिए की, उसे बी को रोकना है या रुखसत कर देना है. दोनों ही सूरत में अल्लाह का हुक्म है की मामला भले ही तरीके से किया जाए, सुरह बकराह में हिदायत फरमाई है की, अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है तो यह रोकना बीवी को परेशान करने के लिए हरगिज ना हो बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए.



अल्लाह कुरआन में फरमाता है-
"और जब तुम औरतो को तलाक दो और वह अपनी इद्दत को पहुँच जाए तो या उन्हें भले तरीके से रोक लो या भले तरीके से रुक्सत कर दो, और उन्हें नुक्सान पहुँचाने के इरादे से ना रोको के उनपर जुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वह दर हकीकत अपने ही ऊपर जुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयतो का मजाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतो को याद रखो और उस कानून को और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने (कुरआन) उतारी है जिसकी वह तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रखो अल्लाह हर चीज से वाकिफ है." (सुराह बकराह-231)

लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है.
इस मौके पर कुरआन ने कम से कम दो जगह (सुरह बकराह आयात 229 और सुरह अन-निसा आयात 20 में) इस बात पर बहुत जोर दिया है की, शोहर जो कछ भी बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रुपये या कोई जायदाद तोहफे के तौर पर दे राखी थी उसका वापस लेना शोहर कल इए बिलकुल जायज नहीं है वह सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वह अब भी बीवी का ही रहेगा. और वह उस माल को लेकर ही घर से जाएगी. शोहर के लिए वह माल वापस मांगने या लेने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना भी जायज नहीं है. और अब इसके बाद बीवी आजाद है. वह चाहे जहां जाए जिसके साथ चाहे शादी करे, अब पहले शोहर का उस पर कोई हक़ बाकी नहीं रहा.



"तलाक़ दो बार है। फिर सामान्य नियम के अनुसार (स्त्री को) रोक लिया जाए या भले तरीक़े से विदा कर दिया जाए। और तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि जो कुछ तुम उन्हें दे चुके हो, उसमें से कुछ ले लो, सिवाय इस स्थिति के कि दोनों को डर हो कि वे अल्लाह की (निर्धारित) सीमाओं पर क़ायम न रह सकेंगे तो यदि तुमको यह डर हो कि वे अल्लाह की सीमाओं पर क़ायम न रहेंगे तो स्त्री जो कुछ देकर छुटकारा प्राप्त करना चाहे उसमें उन दोनो के लिए कोई गुनाह नहीं। ये अल्लाह की सीमाएँ हैं। अतः इनका उल्लंघन न करो। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करे तो ऐसे लोग अत्याचारी हैं। (229)"

इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी जिंदगी में दोबारा शादी करना चाहे तो वह कर सकते है. इसके लिए उनको आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा. और शोहर को फिरसे महर देना होगा और बीवी को फिरसे महर लेना होगा.

अब अगर दूसरी बार निकाह के बाद भी शोहर बीवी के बिच झगडा हो जाता है और बात तलक तक आजाती है तो ऊपर बाताया हुआ तलाक का प्रोसेस फिरसे दोहराना होगा.

और अगर दूसरी बार भी तलाक हो जाता है और फिर शोहर बीवी अलग हो जाते है और फिर तीसरी बार भी शादी करना हाहते है तो शरियत के मुताबिक़ उन्हें शादी करने की इजाजत है.

लेकिन अब तीसरी तलाक हो जाती है तो फिर ना तो रुजू कर सकते है ना आपस में निकाह किया जा सकता है.
(क्यूंकि शादी-ब्याह बच्चो का खेल नहीं, और शरियत कानून का मजाक बनाने का किसीको अधिकार नहीं)

अब आती है हलाल की बारी. तिन तलाक यानी एक तलाक के बाद तिन महीने का वक्त फिर निकाह फिर तिन महीने का वक्त फिर निकाह इस तरह से इद्दत का वक्त नौ महीने और दो निकाह के बिच का वक्त (कितना भी हो सकता है) मिलाकर हम अंदाजा एक साल मानके चलते है.

हलाला
अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाईश नहीं लेकिन सिर्फ ऐसे की, अपनी आजाद मर्जी से वह औरत किसी दुसरे से शादी करले और इत्तेफाक से उनका भी निबाह ना हो और दूसरा शोहर भी ऊपर बताये हुए तरीके से तलाक देदे, या मर जाए तो ही वह पहले शोहर से चौथी बार निकाह कर सकती है. और दुसरे मर्द से शादी और तलाक इत्तेफाक से हो तो, वरना पहले मर्द से शादी करने के लिए दुसरे मर्द से शादी करना फिर उसे तलाक देना यह नाजायज हराम है.



खुलाअ
अगर सिर्फ शोहर के ना हहते हुए बीवी तलाक चाहती होगी, और शोहर नेक इंसान होगा तो जाहिर है की वह बीवी को मनाने समझाने की कोशिस करेगा, और फिर उसे तलाक दे देगा. लेकिन अगर शोहर बीवी के मांगने के बाद भी तलाक नहीं दे रहा तो बीवी के लिए यह आसानी राखी गयी है की, बीवी शहर के काजी (न्यायाधीश) के पास जाए और उससे शोहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे, इस्लाम ने काजी (न्यायाधीश) को यह अधिकार दे रखा है की, वह उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे. जिससे उनकी तलाक हो जायेगी. कानून में इसे "खुला" कहा जाता है.

और यह है तलाक का सही तरिका तिन तलाक का वक्त अगर हम इकट्ठा करते है तो सिर्फ इद्दत के दिन को ही काउंट किया जाए तो 9 महीनो का वक्त लग जाता है. लेकिन भारतीय मीडिया और दुश्मनाने इस्लाम ने तलाक का मजाक बनाकर "तलाक-तलाक-तलाक" एक सांस में कहकर गैरमुस्लिमो और अनजाने मुसलमानों के दिल में एक जहर सा फैलाया हुआ है. और इस तथ्य को ना जानकर इसपर सोशल मीडिया में बहस करने वाले रिकामे, फ़ालतू के लोगो की भी कमी नहीं है. लेकिन एक बात तो पत्थर की लकीर है और वह यह है की, दुनिया में इस्लाम के खिलाफ सबसे ज्यादा बोला गया, लिखा गया और आज भी यही हाल है. और दुनिया का एक ही ऐसा मजहब इस्लाम है जो सबसे ज्यादा तेजी से फैला गया और आज भी फ़ैल रहा है.
-वस्सलाम
DEEWALI DHAMAKA