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गुजरात: दलित अत्याचार के विरोध में उमड़ा एससी मुस्लिमो का जनसैलाब

ऊना। गुजरात के ऊना में दलित अत्याचार के खिलाफ जनसैलाब उमड़ा है। हजारों लोग आज स्वतंत्रता दिवस के दिन जमा हुआ है। चारों तरफ लोग ही लोग दिख रहे हैं। हर किसी के हाथ में बाबा साहेब का नीला झंडा है।

दलित अत्याचार के खिलाफ गुस्सा
दलित, आदिवासी, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बाबा साहेब अंबेडकर के बैनर तले जमा हुआ है। कोई पार्टी या दल इसमें शामिल नहीं है। 5 अगस्त से लोग अहमदाबाद से चले थे और आज 15 अगस्त के दिन ऊना में जमा हुआ है। हजारों की भीड़ है।


दलितों की हुई थी पिटाई
उना में गोरक्षा के नाम पर गुंडों ने दलित युवकों की पिटाई की थी। जिसके बाद से देशभर में प्रदर्शन जारी है। वहीं लोग ऊना में जनसभा कर रहे हैं।

बीएसपी सुप्रीमो ने उठाया था संसद में मामला
बीएसपी सुप्रीमो मायावती दलितों की पिटाई का मुद्दा संसद में उठाया था। उसके बाद वो अहमदाबाद जाकर पीड़ितों से भी मिली थीं। जिसके बाद से देशभर में दलित अत्याचार के खिलाफ दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यकों में गुस्सा है।

आज हिन्दुस्तान के आज़ादी की 70वीं सालगिराह है। पूरा देश स्वतंत्रता और अधिकारों का प्रतीक माने जाने वाले इस दिन की खुशियों को मनाने में सराबोर है लेकिन इसके इतर आज के दिन भी लोग आज़ादी और अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहें हैं।

यूँ तो हमारे देश को आज़ाद हुए 69 साल हो चुके हैं लेकिन यह आजादी काल्पनिक औऱ अधूरी सी लगती है। तब भी और अब भी। गैर-बराबरी ब-दस्तूर जारी है। सामाजिक-आर्थिक समता और समानता नदारद है।

असल में सत्ता में लगातार बैठे आ रहे शोषक मानसिकता रखने वालों की धूर्तता का नतीजा है कि तमाम तरह के उत्पीड़न और अपने बुनियादी अधिकारों के लिए दलितों को आज भी ऊना में आन्दोलन करना पड़ रहा है। लेकिन इस बार यह लड़ाई अकेली नहीं है। इस लड़ाई में देश के मुस्लिम भी उनके साथ मिलकर विरोध की धार को तेज़ कर रहें हैं।

देखिए ! ऊना आन्दोलन की आज की यह तस्वीरें जो दलित-मुस्लिम एकता की एक मज़बूत और खूबसूरत मिसाल पेश कर रहीं हैं।

दरअसल ऊना के समढियाल गांव में गौरक्षकों के कहर का शिकार हुए दलितों पर हुई ज्यादती के विरोध में ये लोग कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। ऊना में लाखों की संख्या में बहुजन और अल्पसंख्यक इकट्ठा हुए हैं।

गौरतलब है कि इस आंदोलन में आज गौरक्षकों की गुंडागर्दी के विरोध में लाखों दलितों ने मरे हुए जानवरों को न उठाने की शपथ ली।



वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने दी बधाई
भारतीय आवाम की यह चट्टानी एकता क़ायम रही तो यूपी चुनाव यानी मार्च 2017 के बाद संघी किसी पर हमला करने के क़ाबिल नहीं रहेंगे। बीजेपी में राजनाथ बनाम मोदी बनाम गडकरी बनाम शाह चलेगा अगले लोकसभा चुनाव तक। सरकार 2019 की गर्मियों तक वेंटिलेटर पर होगी।
मैं तो सिर्फ यह अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहा हूँ कि जनता की एकजुटता को तोड़ने और अशांति फैलाने के लिए RSS क्या करेगा और ब्राह्मणवादी मीडिया उसे कैसे उछालेगा। वह चीज गाय तो नहीं है। क्या है वह चीज जिसका इस्तेमाल एकता को तोड़ने के लिए होगा?
वैसे ये लोग हैं बहुत शातिर। कुछ कोशिश तो करेंगे ज़रूर। हालाँकि उनकी हमेशा चलती नहीं है। मिसाल के तौर पर बिहार में चुनाव से पहले वे सांप्रदायिकता नहीं भड़का पाए।
मौजूदा दौर का दलित, बहुजन एजेंडा शांति और भाईचारा है।
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ।



वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल का मीडिया के खिलाफ गुस्सा
चैनलों में ऊना, गुजरात की खबर क्यों खोज रहे हैं? आपके बाप का चैनल है क्या और वहाँ क्या आपके रिश्तेदार काम करते हैं? जिनके रिश्तेदार हैं, उनको दिखा रहे हैं।
दिल्ली में आज की तारीख में एक दलित एंकर नहीं है। चैनलों में कभी-कभार सवर्ण दया और सहानुभूति तो मिलेगी, आपके हक़ की बात नहीं।
हां, दलित उत्पीड़न, हत्या, बलात्कार की खबर वे खूब दिखाएंगे। मारने वालों को दबंग बताएँगे।
रोता हुआ दलित उन्हें पसंद है। मुट्ठी बाँधकर हक़ माँगते दलित उन्हें पसंद नहीं। मुसलमानों के साथ, पिछड़ों के साथ एकजुट होते दलितों से संपादकों, एंकरों का जी घबराता है।
नाम के लिए पाँच लोगों के बीच बिठा देंगे एक कमज़ोर सा "दलित चिंतक," जो आपकी बात मज़बूती से रख नहीं पाएगा। अंत में उसी से कहलवा देंगे कि आरक्षण ख़तम होना चाहिए। वह बोल भी देगा, क्योंकि उसे अगली बार चैनल पर चेहरा दिखाने का लालच है।
समझ लीजिए कि आपके बाप का चैनल नहीं है।

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