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सुनो किसी शायर ने ये कहा बहुत खूब

अपनों के दरमियान सियासत फिजूल है.....
मकसद ना हो जब कोई बगावत फिजूल है......
नमाज, रोजा, जकात, सदका, खैरा, या हज.......!
माँ बाप नाखुश तो हर इबादत फिजूल है..........!

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