हिन्दू धर्म से अलग 'स्वतंत्र लिंगायत धर्म' मान्यता की मांग

कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना व अन्य राज्याें में बसे लिंगायतों की मांग है कि उनके समुदाय को अलग धर्म के तौर पर मान्यता दी जाए

चुनाव और राजनीति जो न कराए सब कम है. कर्नाटक से बनी एक ख़बर इसकी ताज़ा मिसाल है. द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक अभी दो दिन पहले ही कर्नाटक के बीदर में लिंगायत समुदाय के क़रीब 50,000 लोग जुटे थे. राज्य के उत्तरी हिस्से में ख़ासा असर रखने वाले इस समुदाय ने कार्यक्रम के दौरान मांग की है कि उसे हिंदू धर्म से अलग मान्यता जाए. नए धर्म के तौर पर.

अख़बार के मुताबिक इस आयोजन में कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों के लिंगायतों ने हिस्सा लिया. कहने के लिए तो यह आयोजन ग़ैर-राजनीतिक था. लेकिन चूंकि कर्नाटक में सालभर के भीतर ही चुनाव होने हैं इसलिए इस पर राजनीतिक रंग भी चढ़ ही गया. आयोजन के एक दिन बाद यानी गुरुवार को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने धारवाड़ इलाके का दौरा किया. इस दौरान लिंगायतों ने उन्हें अपनी मांग से संबंधित ज्ञापन सौंपा. मुख्यमंत्री ने भी आश्वासन दिया कि वे लिंगायतों की मांग को केंद्र सरकार तक पहुंचाएंगे.



ग़ौरतलब है कि कर्नाटक में लिंगायत आबादी सबसे ज़्यादा है. राज्य की कुल छह करोड़ की आबादी में लिंगायत 17 फीसदी के आसपास हैं. राजनीतिक रूप से यह समुदाय भाजपा का समर्थक रहा है और कांग्रेस इसे अपनी तरफ लाने की कोशिशें करती रही है. जहां तक धार्मिक स्वरूप का सवाल है तो लिंगायतों काे हिंदू शैव समुदाय का हिस्सा माना जाता है. हालांकि इस समुदाय के बहुतायत लोग अब धर्मगुरु बासवन्ना काे अपना आराध्य मानने लगे हैं जिन्होंने हिंदू जाति व्यवस्था के ख़िलाफ और समाज में समानता के लिए संघर्ष किया था.

वैसे यह पहला वाक़या नहीं है कि जब कर्नाटक से कोई पृथकतावादी सुर बुलंद हुआ हो. अभी इसी साेमवार को राज्य की सिद्धारमैया सरकार ने जम्मू-कश्मीर की तरह कर्नाटक का अलग झंडा तय करने की संभावना पर सुझाव देने के लिए नौ सदस्यीय समिति बनाई है. सरकार ने यह कदम कर्नाटक विद्यावर्धक संघ के अध्यक्ष पाटील पुटप्पा और सामाजिक कार्यकर्ता भीमप्पा गुंडप्पा गदद द्वारा सौंपे प्रतिवेदन के आधार पर उठाया है. इसमें कन्नड़ 'नाडु' (कन्नड़ भाषा बोलने वालों का क्षेत्र) के लिए अलग झंडा बनाने की मांग की गई है. इससे पहले राज्य हिंदी विरोध को लेकर सुर्खियों में आया था. कर्नाटक रक्षणा संगठन के सदस्यों ने बेंगलुरू मेट्रो स्टेशनों पर लगे हिंदी साइन बोर्ड पर कालिख पोत दी थी. संगठन का आरोप है कि केंद्र सरकार राज्य पर हिंदी थोप रही है.
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