Movement- ‘भाजपाइयों तमिलनाडु छोड़ो’ : पेरियार आन्दोलन

थन्तई पेरियार द्रविड़ कषगम (टीपीडीके) का दावा है कि केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी, तमिलनाडु में जल की आपूर्ति को बाधित कर रही है, विनाशकारी हाइड्रोकार्बन निकास परियोजना का समर्थन कर रही है और नीट परीक्षा राज्य पर लाद रही है। इस सबका उद्देश्य राज्य को झुकाना और उसकी राजनीति में अपने लिए जगह बनाना है। सिन्थिया स्टीफन की रपट

थन्तई पेरियार द्रविड़ कषगम (टीपीडीके) के प्रवक्ता मनोज कहते हैं, ‘‘हम तमिलों को पूरा यकीन है कि भाजपा तमिल-विरोधी है। हम यह मांग करते हैं कि उसे चैन्नई के अपने पार्टी कार्यालय कमलालयम में ताला डाल देना चाहिए। हमने भाजपा के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद कर दिया है और हम उसे जारी रखेंगे ताकि हम लोगों को यह समझा सकें कि भाजपा को तमिलनाडु से बाहर रखना क्यों आवश्यक है’’।


टीपीडीके के कार्यकताओं ने चेन्नई-स्थित भाजपा कार्यालय पर प्रदर्शन किया और भाजपा का झंडा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पुतला जलाया
गत 14 मार्च को टीपीडीके के लगभग 200 कार्यकर्ताओं ने चैन्नई के समृद्ध टी. नगर इलाके के पोंडी बाज़ार में स्थित भाजपा के राज्य कार्यालय कमलालयम के समक्ष प्रदर्शन किया। पुलिस ने उन्हें भवन से करीब 50 मीटर पहले रोक दिया। मनोज के अनुसार, कार्यकर्ताओं ने भाजपा के झंडे को जलाया। जब पुलिस उन लोगों को गिरफ्तार करने के लिए आगे बढ़ी, जो झंडे को जला रहे थे तभी कार्यकर्ताओं के एक दूसरे दल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पुतले को आग लगा दी।

पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने-जिसके दौरान उन्होंने अंतरिम मुख्यमंत्री की नियुक्ति कर दी थी- और उसके बाद उनकी मृत्यु से भाजपा को ऐसा लग रहा है कि तमिलनाडु की राजनीति में उसके लिए जगह बन गई है। तमिलनाडु, दक्षिण भारत का एकमात्र राज्य है, जिसमें भगवा पार्टी की पैठ नहीं है। भाजपा, राज्य में बन गए राजनीतिक शून्य का लाभ उठाते हुए वहां अपने पैर जमाना चाहती है। भाजपा को राज्य के पिछले विधानसभा चुनाव (2016) में पहली बार सफलता मिली और दक्षिण तमिलनाडु के एक विधानसभा क्षेत्र से उसका उम्मीदवार चुनाव जीत गया।


अगर भाजपा तमिलनाडु में पैर नहीं जमा सकी है तो इसका कारण यह नहीं है कि उसने इसके लिए प्रयास नहीं किए। वह जो कुछ भी कर सकती थी, उसने किया। परंतु फिर भी वह राज्य की राजनीति में स्थान बनाने में सफल न हो सकी।

यद्यपि राज्य में गैर-ब्राह्मण एकजुटता की लंबी परंपरा है परंतु इसके साथ ही, वहां जातिगत वफादारियां भी बहुत मज़बूत हैं। ईवी रामासामी (ईवीआर), जो पेरियार के नाम से लोकप्रिय थे, के नेतृत्व में सन 1920 के दशक से लेकर सन 1973 में उनकी मृत्यु तक, लगभग 50 वर्ष चले आंदोलन ने समाज के एक बड़े तबके को ब्राह्मण-विरोधी बना दिया है और उसे एक अलग द्रविड़ पहचान दी है। इस आंदोलन का प्रभाव अभी भी बाकी है और शायद यही कारण है कि तमिलनाडु के अधिकांश क्षेत्रीय दलों के नाम में ‘द्रविड़’ शब्द शामिल है।

तमिलनाडु में ब्राह्मणों को बाहर से आए आर्य माना जाता है, जिन्होंने तमिल भाषा और तमिलों की पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं को कमज़ोर किया और देश व विशेषकर मद्रास प्रेसिडेन्सी क्षेत्र में साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन के दौरान और उसके तुरंत बाद, राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता पर कब्जा कर लिया। भारत की स्वतंत्रता के समय तमिलनाडु की राजनीति में सत्यमूर्ति व सी. राजगोपालाचारी का बोलबाला था। राजगोपालाचारी, जिन्हें राजाजी के नाम से जाना जाता था, तमिल ब्राह्मण थे। वे दार्शनिक थे और कांग्रेस नेता थे। राजगोपालचारी स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। उन्होंने देश के आखिरी वायसराय लार्ड माउन्टबेटन का स्थान लिया। बाद में वे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी बने। ब्राह्मणों ने सभी स्तरों के प्रशासनिक पदों पर कब्जा कर लिया और न्यायपालिका, वकालत, शैक्षणिक संस्थाओं और यहां तक कि निजी क्षेत्र में भी उनका पूर्ण वर्चस्व स्थापित हो गया।


जयललिता (बाएँ) की मृत्यु के बाद भाजपा को ऐसा लग रहा है कि राज्य में एक राजनीतिक शून्य बन गया है. ओ. पन्नीरसेलवम (दायें) को खड़ा कर वह राज्य की राजनीति में अपनी पैठ बनाना चाहती है
ईवीआर के बौद्धिक नेतृत्व और उनकी सांगठनिक क्षमताओं के चलते, उनके विचार जन-जन तक पहुंचे और उनके आंदोलन ने तेज़ी पकड़ी। इस आंदोलन का प्रभाव अब भी राज्य के लोगों पर है।

के. रामकृष्णन के नेतृत्व में टीपीडीके, पेरियारवादी परंपराओं को मज़बूती देने के अभियान में अगुवा है। पिछले साल उसने बहुप्रचारित रावण लीला का आयोजन किया था, जिसमें राम और सीता के पुतले जलाए गए थे। यह आयोजन उत्तर भारत के राजा राम की दक्षिण भारत पर विजय के विरोध के प्रतीक के रूप में किया गया था। पुलिस बल की भारी मौजूदगी के बाद भी कार्यकर्ताओं ने अपना आयोजन सफलतापूर्वक किया।

मनोज से यह पूछने पर कि वे भाजपा को तमिल-विरोधी क्यों मानते हैं, वे इसके कारणों की एक लंबी सूची प्रस्तुत करते हैं, जिनमें पर्यावरणीय मुद्दों से लेकर भाजपा नेताओं के वक्तव्य तक शामिल हैं। उनका कहना है कि इन सब से यह पता चलता है कि भाजपा, तमिलों की विरोधी है। ‘‘पूरे देश में भाजपा ने राज्यों की राजनीति में घुसपैठ कर ली है। केवल यहां वह सफल नहीं हुई है,’’ वे कहते हैं। ‘‘अब वह एआईएडीएमके के विभिन्न गुटों में बंट जाने का लाभ उठाते हुए राज्य में अपने लिए ज़मीन तैयार करना चाहती है। उसी ने ओ पनीरसेल्वम को खड़ा किया है। परंतु टीपीडीके और द्रविड़ विदुथलई काची, तमिज़ार विदियल काची और तमिल पुलीगल सहित टीपीडीके यह सुनिश्चित करेगी कि भाजपा का पीछे के दरवाजे से तमिलनाडु की राजनीति में घुसने का षड़यंत्र सफल न हो सके।’’


इस सिलसिले में मनोज भाजपा की तमिलनाडु इकाई के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में राज्यसभा सदस्य इला गणेशन के 26 फरवरी के वक्तव्य का उल्लेख करते हैं। यह वक्तव्य तमिलनाडु में शिवगंगई के नज़दीक हाइड्रोकार्बन निष्कर्षण परियोजना के विरोध के संदर्भ में दिया गया था। गणेशन ने कहा था, ‘‘राज्य की भलाई के लिए एक ज़िले की बलि दी जा सकती है और जिले की खातिर एक गांव को बलि चढ़ाया जा सकता है’’।

तमिलनाडु, प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और उनके इस्तेमाल से संबंधित कई विवादों में फंसा हुआ है। कावेरी जल विवाद लगभग एक सदी पुराना है। कावेरी, राज्य की एकमात्र बारहमासी नदी है और इस नदी के आसपास का क्षेत्र, खाद्यान्न उत्पादन के लिए जाना जाता है। लगातार सूखा पड़ने, राज्य की पानी में अपना वाजिब हिस्सा प्राप्त करने में असफलता और सिंचित क्षेत्र में वृद्धि के कारण पानी की मांग में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। यहां तक कि कावेरी के उत्तरी तट पर स्थित क्षेत्रों में पीने के पानी तक की कमी हो गई है।

मनोज कहते हैं कि कावेरी पर दो चेक डैम बनाए जा रहे हैं। पहला, केरल में भवानी में और दूसरा मेकेदातू, कर्नाटक में। भवानी का चेक डैम  केरल सरकार द्वारा इसलिए बनाया जा रहा है ताकि वह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण द्वारा कावेरी के पानी में उसे दिए गए हिस्से का उपयोग कर सके। कर्नाटक सरकार, राज्य के पीने के पानी की कमी वाले शहरी क्षेत्रों में जल प्रदान करने के लिए चेक डेम का निर्माण कर रही है। इसके अलावा आंध्रप्रदेश भी पलार नदी पर चेक डेम बना रहा है। यह चेक डेम उस स्थान के ठीक पहले बनाया जा रहा है, जहां यह नदी तमिलनाडु में प्रवेश करती है।


यह सब भाजपा के तमिल-विरोधी होने का सबूत कैसे है? मनोज के अनुसार, केन्द्र सरकार नदियों के पानी के राज्यों के बीच बंटवारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और वह जानबूझकर ऐसी स्थिति बनाना चाहती है जिससे तमिलनाडु में सिंचाई और पीने के पानी की भारी कमी हो जाए।

राज्य के नेडुवासल क्षेत्र में चल रही प्राकृतिक गैस परियोजना का स्थानीय स्तर पर कड़ा विरोध हो रहा है। यह एक अत्यंत उपजाऊ क्षेत्र है, जिसमें पर्याप्त भूजल स्त्रोत हैं और जहां कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं। इस क्षेत्र में कई सालों से अलग-अलग स्थानों पर ड्रिलिंग की जा रही थी। यह बताया गया है कि वहां हाइड्रोकार्बन का भूमिगत खजाना मिल गया है और उसका निष्कर्षण व्यावसायिक दृष्टि से लाभप्रद होगा। परंतु हाइड्रोकार्बन के भूमिगत स्त्रोतों का पता लगाने के लिए जो ड्रिलिंग की गई थी, उसके अनुभव से स्थानीय लोगों को यह अच्छी तरह से समझ आ गया है कि यह परियोजना उनके हित में नहीं होगी। इस परियोजना के विरोधियों का कहना है कि ड्रिलिंग के कारण, प्रदूषक रसायन भूमिगत जल में मिल जाएंगे, चट्टाने दरकेंगी, भूमि के ऊपर के जल स्त्रोत दूषित होंगे और ज़मीन की उर्वरता कम होगी। वे कहते हैं कि प्रदूषण से इस क्षेत्र में रहना भी दूभर हो जाएगा क्योंकि वहां पीने का पानी तक नहीं बचेगा।

दक्षिणी तमिलनाडु के नेदुवसल क्षेत्र के किसान, वहां प्रस्तावित हाइड्रोकार्बन निष्कर्षण परियोजना का विरोध कर रहे हैं
इला गणेशन ने इसी पृष्ठभूमि में यह कहा था कि किसी जिले या गांव की व्यापक जनहित में बलि चढ़ाई जा सकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इससे लोगों में नाराज़गी की लहर दौड़ गई है।

एक अन्य मुद्दा उच्च शिक्षा से जुड़ा हुआ है। तमिलनाडु में शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 69 प्रतिशत आरक्षण है, जो कि देश में सबसे ज्यादा है। इसके कारण समाज के सभी वर्गों के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाना संभव हो सका है। राज्य में 27 मेडिकल कॉलेज हैं जिनसे हर साल हज़ारो डॉक्टर पढ़कर निकलते हैं और पूरे देश और दुनिया में अलग-अलग स्थानों पर काम कर रहे हैं। केन्द्र सरकार ने यह आदेश जारी किया है कि मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश सीबीएसई द्वारा आयोजित नीट परीक्षा के माध्यम से ही दिया जाए। मनोज का कहना है कि इससे तमिलनाडु के विद्यार्थियों को नुकसान होगा क्योंकि राज्य की स्कूली शिक्षा प्रणाली सीबीएसई से बहुत अलग है। इसका दूरगामी प्रभाव यह होगा कि एक बाहरी शिक्षा व्यवस्था तमिलनाडु पर थोप दी जाएगी जिससे तमिलों की भाषा और उनकी सांस्कृतिक पहचान कमजोर होगी।

मनोज का कहना है कि राज्य पर हिन्दी थोपी जा रही है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के द्वारा राज्य में लगाए गए सभी बोर्ड केवल हिन्दी और अंग्रेजी में हैं तमिल में नहीं।

‘‘हम भाजपा को एक ऐसी पार्टी मानते हैं जो दक्षिण भारत की द्रविड़ सभ्यता, विशेषकर तमिलनाडु पर आर्यों का वर्चस्व कायम करना चाहती है। इसलिए हम कहते हैं कि भाजपा के लिए हमारे राज्य में कोई जगह नहीं है। हम यह बिलकुल नहीं चाहते कि भाजपा को तमिलनाडु में पैर जमाने का मौका मिले,’’ वे कहते हैं।
(यहाँ से साभार)