जवानों ने मेरी 13 साल की बहन को मेरी आँखों के सामने हवस का शिकार बनाकर मार डाला'


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- आचार्य सुभाष विक्रम
एमएससी फाइनल ईयर में था। उस टाइम हमारे कॉलेज में बहुत से कश्मीरी छात्र- छात्राएं पढ़ते थे। इन्ही में से एक मेरा घनिष्ठ था गुलज़ार। आम कश्मीरियों जैसा गोरा चिट्टा। काले काले घुंघराले बाल। पढाई ख़त्म होने के बाद हम दोनों ने एक दूसरे को अपने अपने पोस्टल अड्रेस और घर में लगे फोन नम्बर्स दिए। इसके पहले गुलज़ार जब भी घर जाता, वहाँ से मेरे लिए ढेर सारे ड्राई फ्रूट्स और कुछ कश्मीरी गरम कपड़े जरूर लाता। जैसे शॉल और ऊनी जैकेट्स। मेरे घर आता कुछ दिन रहता और हम खूब बातें करते। वो कुछ झिझकते हुए बताता कि कैसे उनकी जिंदगी बद से बदतर होती चली जा रही है।

पहले उसके हाउसबोट चलते थे। काफी सैलानी उनमें ठहरते थे, जिससे अच्छी खासी आमदनी हो जाती थी। मगर मिलिटेंट्स ने सब तबाह कर दिया। हमें दोहरी मार पड़ी। मिलिटेंटों ने तो हमको लूटा ही हमारे मुल्क की मिलिट्री ने भी जी भर के लूटा खसोटा। मिलिटेंट्स आते, रात को किसी आम कश्मीरी के घर में छिप जाते। कोई वारदात करते और उस कश्मीरी के डर की वजह से उसी कश्मीरी द्वारा वापस पीओके सुरक्षित पहुंचा दिए जाते।


असली खेल तब शुरू होता, जब हमारे अपने देश की मिलिट्री आती फिर एक एक घर की तलाशी लेती और निरीह नागरिकों को परेशान करना शुरू कर देती। पुरुषों को बिना कोई जुर्म साबित हुए अपने साथ उठा ले जाती। उन्हें कई-कई साल के लिए किसी जेल में बंद कर दिया जाता या उनकी हत्या करके लाश को किसी जंगल या पहाड़ी खोह में गायब कर दिया जाता था। घर की जवान से लेकर बूढी या कम उम्र बच्चियों तक को नही छोड़ा जाता। ये हमारे देश के तथाकथित रक्षक उनकी अस्मिता के भक्षक बन जाते। सबसे बुरा उस औरत पर बीतता, जिसके पति को मिलिट्री उठा कर ले गयी होती। जवान बेटी के सामने अधेड़ माँ का और उसी घायल बेबस माँ के सामने कमसिन बेटी को कई-कई जवान अपनी हवस का शिकार बनाते। रात को अक्सर किसी न किसी घर से कोई चीख़ सुनाई देती। सुबह तक एक और जिन्दा लाश अपने तन और मन में हजारों जख्म लिए जीने को मजबूर हो जाती।
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मेरे दोस्त गुलज़ार के दिल में भी हमारी मिलिट्री के लिए जबरदस्त गुस्सा था। मगर मेरे सामने वह कभी भी खुल कर व्यक्त नहीं कर पाता था। बहुत दिनों बाद दिवाली की छुट्टियों में मुझे गुलज़ार का आखिरी ख़त मिला था। जिसे उसने जेल से लिखा था और उसके किसी दोस्त ने जम्मू से पोस्ट किया था। उसने लिखा था। डियर विकरम। मैं तुमसे सहमत होना चाहता था। लेकिन इन जवानों ने मेरी 13 साल की बहन को मेरी आँखों के सामने अपनी हवस का शिकार बना कर मार डाला। फिर मैंने भी कलम छोड़ कर बंदूक उठा ली। मेरा अंजाम भी शायद वही हो कि मैं भी अपनों के पास पहुंचा दिया जाऊं। लेकिन दोस्त मलाल इस बात का रह जाएगा कि जिस देश को हमने अपना माना उसने हमें कभी अपना नही समझा।


बहुत से दोस्तों की पोस्ट पढ़ कर खुद को लिखने से नही रोक सका। लेकिन दुःख हुआ कि कुछ दोस्त मूल बातों को दरकिनार करके सिर्फ नफरत के बीज बोने में लगे हैं। चाहे कोई भी बहाना हो। (आचार्य सुभाष विक्रम ने अपना ये अनुभव फेसबुक वॉल पर सातझा किया है)