मनुवाद से पीड़ित शुभम उर्फ़ अंसार मनुवादी व्यवस्था ख़त्म करेंगे ?

मनुवाद से पीड़ित शुभम उर्फ़ अंसार मनुवादी व्यवस्था ख़त्म करेंगे ?
जिनके साथ रहा वह समतावादी हिन्दू, जसके नाम का इस्तेमाल किया वह भी समतावादी हिन्दू, और जिसने अपने घरमे रहने नहीं दिया वह मनुवादी हिन्दू, 
सोशल डायरी ब्यूरो
भारत में मुसलमानों के साथी भेदभाव की वारदाते बढती जा रही है. मुसलमानों को जानबुझकर कमजोर बनाने की कोशिसे की जारही है. मनुवादी मानसिकता के लोग मुसलमानों और एससी, एसटी (दलित) को आज भी अछूत समजते है. और मनुस्मृति के समर्थक मनुस्मृति कायम करना चाहते है. लेकिन डा. बाबासाहब आंबेडकर इन्होने समता, स्वतंत्रता बंधुता और न्याय पर आधारित संविधान का निर्माण किया. और उसी संविधान को ख़त्म करने की कोशिसे मनुवादी व्यवस्था कर रही है.

हाल ही में चर्चा के विषय बने नवनिर्वाचित आईएएस शेख अंसार क्या इस मनुवादी मानसिकता को ख़त्म करने की कोशिस करेंगे ? क्यूंकि एक ही मुसलमान आईएएस, आईपीएस या अन्य पदों पर है ऐसा नहीं है. कई मुस्लिम नेता, अधिकारी, कर्मचारी मुसलमान है लेकिन उनमेसे कुछ फिसद ही लोग है जो मनुवादी असमानता की व्यवस्था का विरोध करते है. और कुछ अधिकारी " अपुन भेले अपना घर परिवार भला" ऐसा सोचते है. तो कुछ लोग तो यहांतक सोचते है की, "झक मराये जनता अपना काम बनता" इस मानसिकता के है. अगर सभी समता की मानसिकता के लोग मनुवादी व्यवस्था ख़त्म करना चाहे तो कर सकते है लेकिन ऐसा नहीं होता. और कुछ ऐसे भी अधिकारी हुए है लेकिन किसीको जियाउल हक़ तो किसीको तंजील बनाया गया.और इस विषय पर हमारे ही स्वघोषित मुस्लिम हितचिन्तक खामोश है. और ऐसे मामले आसानी से दबाने में मनुवादी कामियाब हुए.

नवनिर्वाचित आईएएस शेख अंसार की आपबीती से वह अंदाजा लगा सकते है की, भारत में मुसलमानों की क्या हालात है और मुसल्मानो को अपनी जिंदगी जीना कितना मुश्किल है यह सब जानते है. इसलिए यह सवाल करने का मन कर रहा है की, "क्या शेख अंसार मनुवादी असमानता की मानसिकता को ख़त्म करने की कोशिस करेंगे?" अब इन्तेजार है के आगे कौन क्या करता है.

आईये कुछ बाते जानते है शुबह्म बनकर आईएएस किये हुए शेख अंसार के बारे में.

भारत में लोकतंत्र है। जाति, धर्म के आधार पर भेदभाव कानूनन अपराध है। लेकिन धार्मिक कर्मकांड ने लोगों को कितना अंधा बना दिया है वह आप इस सच्ची कहानी से समझ जाएंगे। आपको धर्म के आधार पर होनेवाले भेदभाव जानकर इंसान होने से ही नफरत होने लगेगी। ये कहानी है 21 साल के अंसार अहमद शेख की जिन्होंने यूपीएससी में 361वीं रैंक लाकर सबसे कठिन परीक्षा में सफलता हासिल की है। लेकिन जब आप यह जानेंगे तो हैरान रह जाएंगे कि मुस्लिम होने की वजह से पुणे जैसे शहर में उन्हें किराए का मकान नहीं मिलता था। लेकिन नाम बदलते ही अंसार को घर मिल गया। लेकिन इसके लिए अंसार को अपने दोस्त का नाम उधार लेना पड़ा। सोचिए 21वीं सदी के भारत में लोग जाति, धर्म के आधार पर किराए का मकान देते हैं। अगर आपकी जाति या मजहब मकान मालिक से मेल नहीं खाता तो वह आपको घर नहीं देगा। अंसार अहमद को किराए का मकान इसलिए नहीं मिलता था कि वो मुस्लिम है। लेकिन पूरी कहानी काफी दर्दनाक है। एक तो पहले से ही आर्थिक तंगी और उसके बाद धार्मिक भेदभाव ने उन्हें सड़क पर ला दिया था।

मुस्लिम ऑटो ड्राइवर के बेटे को उधार लेना पड़ा हिंदू नाम

दरअसल अंसार अहमद शेख महाराष्ट्र के जालना जिले के शेरगांव के रहनेवाले हैं। यूपीएससी में 361वीं रैंक हासिल की है। पिता ऑटो ड्राइवर हैं इसलिए आमदनी का अंदाजा आप लगा सकते हैं। लेकिन अंसार ने हिम्मत नहीं छोड़ी। उन्होंने पुणे के फॉर्ग्यूसन कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया और फिर यूपीएससी की तैयारी करने लगे। लेकिन इससे बाद उन्हें वह सब झेलना पड़ा जो काफी दहला देने वाला था। अंसार को किराए पर मकान नहीं मिलता था। लोग उसका नाम सुनते ही घर देने से मना कर देते थे। अंसार के दोस्त जो मजहब से हिंदू थे उन्हें आसानी से घर मिल गया। लेकिन अंसार को लगातार भटकने के बाद भी किराए का मकान नहीं मिला क्योंकि वह मुस्लिम था। 

हिदूं दोस्त का नाम उधार लिया

किराए का घर ना मिलने से परेशान अंसार अहमद ने हिंदू साथी का नाम उधार लिया। जब भी किराए का मकान ढूंढने जाते अपना नाम शुभम बताते। फिर क्या था। मजहब के नाम पर अंधे हो चुके लोग उसे अपने मजहब का मानने लगे और आराम से किराए का घर मिल गया। नाम बदलकर अंसार से शुभम बने अंसार ने जमकर मेहनत की और यूपीएससी में 361वीं रैंक हासिल की। 

'सबको बता दो मेरा नाम अंसार अहमद शेख है शुभम नहीं'

यूपीएससी में सफलता हासिल करने के बाद अंसार अब कहते हैं कि अब सबको बताऊंगा कि मेरा नाम शुभम नहीं अंसार अहमद शेख है। उन्हें रंज तो है कि धर्म की वजह से उन्हें नाम तक उधार लेना पड़ा। लेकिन अब वो खुलकर कहना चाहते हैं कि वो शुभम नहीं अंसार हैं। अब अंसार कहते हैं कि उन्हें अब नाम बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब वह जोर से कहते हैं कि मेरा नाम अंसरा अहमद शेख है। अंसार कहते हैं कि मैं शुभम नहीं अंसार अहमद शेख ही हूं। 

घर में पहले पढ़े लिखे हैं अंसार अहमद

जालना के शेरगांव के रहनेवाले अंसार अहमद शेख घर में पहले ग्रेजुएट हैं। बड़े भाई की गरीबी की वजह से पढ़ाई पूरी नहीं पाई। पिता ऑटो ड्राइवर हैं। इसलिए काफी मुश्किल हालात में पढ़ाई करनी पड़ी। लेकिन मजहब की वजह से जो पुणे में उन्हें सहना पड़ा वो जिंदगी भर उनको सालता रहेगा। लेकिन अंसार का कहना है कि अब वो हिंदू-मुस्लिम के बीच बनी खाई को पाटने के लिए काम करेंगे।