मुसलमान मानसिक गुलाम या डरा हुआ या गुमराह ?

मुसलमान मानसिक गुलाम या डरा हुआ या गुमराह ? - अहेमद कुरेशी

इस दौर में हालात कुछ और ही बने हुए है. और सबसे जागरूक मानी जाने वाली कौम के 40 फिसद लोग मानसिक गुलामी का शिकार हुए नजर आते है और 40 फिसद लोग डरे हुए नजर आते अहि और 10 फिसद लोग है जो जागरुक है, पढेलिखे है, और समाज के लिए अपना भरपूर वक्त दे रहे है. अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे है. और 10 फीसदी लोग है जो पढेलिखे है, आमिर है, जागरुक भी है लेकिन वह स्वार्थी है, बस अपना सोचते है और पैसा कमाने की होड़ लगी रहती है. यही कारण है की, पिछड़ी कौम और पिछाद्ती जारही है. जिस कौम ने भारत से वर्णव्यवस्था को डिस्टर्ब किया, जिस कौम ने जातिव्यवस्था को हिला दिया, जिस कौम ने समानता का सन्देश दिया, उसी कौम के कुछ लोग आज रास्ता भटग गए है/भटकाए गए है.

मुसलमानों को मानसिक गुलाम बनाना और और मुसलमानों का ध्यान भटकाने के लिए जोरो शोर से कार्य किया जा रहा है. और इस षडयंत्र में 80 फिसद लोग फंसे जा रहे है. मानसिक गुलाम लोगो के कुछ उदाहरण




01) जहां भी मुसलमानों के खिलाफ कोई अनुचित घटना घटी, (जैसे अखलाख) 80 फिसद मुसलमान कहते है अल्लाह उनको देख लेगा.
02) खुद अगर किसी मुसीबत में फंस जाए या किसीने फंसाया तो " अल्लाह ने चाहा हो रहा है"
03) अगर कोई जुल्म करता है तो लोग कहते है अल्लाह जालिमो को देख लेगा.
मेरे यह बात समझमे नहीं आती (नऔज्बिल्ला) अल्लाह क्या हमारे बाप का नौकर है ? जो सबकुछ करेगा ? अगर मैं 10 मंजिला इमारत से कूद जाऊं और कहूँ अल्लाह मुझे बचा लेगा तो यही लोग मुझे बेवकूफ कहेंगे. और जो लोग अल्लाह - अल्लाह करते है उसी अल्लाह सुभानऊ तआला ने कुरआन में हुक्म दिया " लकद काना लकुम फी रासुलुल्लाही उसवत उल हसना" यानी ऐ लोगो मैंने तुम्हारे लिए मुहम्मद (s.) की जिंदगी को आइडियल और मॉडल बनाया है. और हमारे नबी करीम सलाल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हर मुसीबत का सामना खुद किया और अल्लाह से मदत मांगी फिर अल्लाह ने उनकी मदत की. जंगे ओहोद के वक्त मुहम्मद (s.) ने खंदक खोदी थी जबके अल्लाह से दुआ के बाद जिब्राईल अमिन यह काम आसानी से कर सकते थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मुहम्मद (s.) कई जंग में खुद शामिल हुए, वो बेसहारा लोगो को सहारा देते थे उन्होंने बेसहारा लोगो को अलाह के हवाले क्यों नहीं किया ? मजलूमों का साथ देते थे उनको अल्लाह के हवाले क्यों नहीं किया ? यह बाते हमको जानना बहुत जरुरी है. तभी हम मानसिक गुलामी से आजाद होंगे.
हम खुदको शारीरिक रूप से आजाद समझ रहे है.
मानसिक रूप से तो हम गुलाम है.

मुसलमानों को भटकाने/गुमराह करने के षड्यंत्र भी जोर पकड़ रहे है. अगर किसी बेवकूफ ने मुसलमान या इस्लाम के खिलाफ बया ने दिया बस फिर क्या देखते हर तरफ से उसली आलोचना की जाती है, जुलुस निकलते है, आंदोलन होते है. लेकिन यह लोग इतना भी नहीं समझते की हम लोग एक कमजोर को ताकतवर बना रहे है. कमलेश तिवारी एक छोटासा संघ का कार्यकर्ता था जिसने इस्लाम (नबी s.) के खिलाफ बयान दिया हमारे लोगोने उसको एक दिन में नेशनल कार्यकर्ता बना दिया. एक-एक जगह लाखो की तादाद में लोग रास्तो पर उतर रहे थे. अब मेरा उन लोगो से यह सवाल है की, यही लोग विधानसभा और लोकसभा में कहाँ थे ? यूपी के जिस जिले में 7 लाख लोग रास्ते पर उतरे थे वह लोग लोकसभा के चुनाव के वक्त कहाँ थे ? जब 7 लाख लोग एक साथ जमा हो सकते है तो फिर उस जिले में एक भी विधायक या सांसद मुसलमान का क्यों नहीं है ? अगर हम 20 फिसद है तो फिर पार्लामेंट में हमारे 20 फिसद सांसद क्यों नहीं ? ऐसे कई सवाल पैदा होते है और तरस आता है की हम क्या थे और क्या हो गए है. सच्चर कमीशन के रिपोर्ट के अनुसार आज मुसलमान एससी, एसटी से भी बदतर हो गया है जो आजसे 60 साल पहले क्या था ? 




एक बात मुझे याद आरही है की, जब सर्कस में शेर होता है तब वह मानसिक (दिमागी) रूप से रिंगमास्टर का गुलाम होता है उसको यह अहेसास नहीं होने दिया जाता के वह शेर है और रिंगमास्टर की उसके सामने कोई औकात नहीं है. बस उसी तरह हमारी कौम मानसिक गुलाम बनती जारही है. और इस गुलामी से आजादी के लिए जो मुसलमान काम कर रहे है  उनकी संख्या कम होने के कारण गुलामी उतनी तेजी से कम नहीं होरही है जितनी होनी चाहिए. मुसलमानों में जागरूकता लाने के लिए 10 फिसद लोग ही है और उनको ही अब जागरूकता के लिए अपने परिवारों की कुर्बानी देकर मैदान में होगा तब ही तबाही से पहले जागरूकता निर्माण होगी.

साम्प्रदायिक ताकतों को प्रतिक्रया देने से बेहतर है के तुम क्रिया करो, अलाह के भरोसे सब काम छोड़ने से बेहतर है खुद पहल करो फिर अल्लाह से दुआ करो, मजलूमों ने मजलूमों के साथ मिलकर जालिमो के खिलाफ लड़ना होगा, भारत में सिर्फ मुसलमान ही नहीं है जो मजलूम है. कुरआन को अच्छी तरह से समझना होगा, नमाज की पाबंदी करनियो होगी, तभी जाकर हम मज्लुमियत से बाहर निकल सकेंगे. और मानसिक गुलामी से भी.
कहीं हम गुलामी को तो पसंद नहीं करने लगे ?

ऐलाने मुहम्मद है की, ईमान संभालो.अमाल बनाना है तो कुरआन संभालो.कुर्बान करो जान माल अब, जान संभालो.गफलत जो हुई तुमसे तो रोओगे वतन को.दो गज तो जमीन दूर है तरसोगे कफ़न को..

नोट: उपरोक्त आर्टिकल सभी मुसलमानों पर लागू नहीं होता. इसमें बुद्धिजीवी लोगो के लिए एक मशवरा है.